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हमारी जंग प्रकृति से जो 450 करोड़ सालों में कभी नहीं हारी https://ift.tt/3d3rC1E

मानव जाति के इतिहास में पहली बार प्रकृति मां ने पूरी दुनिया को अपने हाथों में ले लिया है। पूरी धरती एक समय में एक ही कोरोना वायरस से लड़ रही है। मेरे सभी विश्लेषण, सभी विचार इसी पर आधारित हैं कि प्रकृति के तर्क और नियमों के तंत्र को ध्यान में रखते हुए इस महामारी का सामना कैसे करें।

अगर आप ऐसा करने की जगह अपना विश्लेषण राजनीति या विचारधारा या इस सोच के साथ शुरू करते हैं कि बहुत हुआ लॉकडाउन, भाड़ में जाए वायरस, तो आप वास्तव में प्रकृति मां को द्वंद्वयुद्ध की चुनौती दे रहे हैं। मैं समझ सकता हूं कि लोग अपना बिजनेस बचाने, वेतन पाने के लिए बेताब हैं। लेकिन, अगर मास्क पहनने, धार्मिक आयोजनों के लिए भीड़ पर रोक को प्रकृति के सम्मान की जगह अपनी निजी स्वतंत्रता का अपमान मानते हैं तो आप एक बड़ी गलती कर रहे हैं।

हम याद रखें कि प्रकृति सिर्फ रसायन, जीव व भौतिक विज्ञान है और जो इसे चलाता है वह है प्राकृतिक चुनाव। हर जीव की यही तलाश है। किसी पारिस्थितिक पनाह में खुद को बचाए रखना, फलना-फूलना और अपना डीएनए अगली पीढ़ी को देने के लिए संघर्ष करना ताकि वे उन जैसे न हो जाएं, जिन्हें बनाने वाले के पास वापस भेज दिया गया और फिर वे लौटे नहीं। और वायरस भी यही करते हैं। वे बचे रहने की कोशिश करते हैं। उदाहरण के लिए कोरोना चमगादड़ के साथ रहा। फिर उसे इंसान में पनाह मिल गई और वह ऐसे नुकसान पहुंचाने लगा, जिससे हमारी जान जा सकती है।

जब यह हुआ तो कोरोना प्रकृति मां का एक और जरिया बन गया, यह देखने के लिए कि हममें से कौन ज्यादा तंदुरुस्त है। प्रकृति मां निर्मम भी है। वह उस ईश्वर की तरह नहीं है, जिसकी इंसान पूजा करते हैं। प्रकृति हिसाब नहीं रखती। वह सोमवार को आपकी दादी को वायरस दे सकती है, बुधवार को तूफान में आपका घर उड़ा सकती है और शुक्रवार को तहखाने में पानी भर सकती है।

इसलिए वह आपकी इस बात पर ध्यान नहीं देती कि आप लॉकडाउन से पक चुके हैं। उसे सिर्फ ‘अनुकूलन’ से फर्क पड़ता है। वह अमीर, गरीब, होशियार नहीं देखती। वह सिर्फ सबसे अनुकूल को ही इनाम देती है, सिर्फ उसे जो उसकी शक्ति का सम्मान करता है। अगर आप उसके वायरसों, जंगल में आग, सूखा, तूफान, बाढ़ आदि का सम्मान नहीं करेंगे तो वो नागरिकों को नुकसान पहुंचाएगी।

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प प्रकृति मां का सम्मान नहीं करते, क्योंकि वे हर चीज को बाजार के पैमाने पर नापते हैं। प्रकृति मां उन्हीं नेताओं को इनाम देती है, जिनकी अनुकूल प्रतिक्रिया सबसे ज्यादा सोची-समझी गई और सामंजस्यपूर्ण होती है। वह वायरसों को ऐसे विकसित करती है कि वे निजी या सामुदायिक प्रतिरोधी तंत्र में कमजोरी ढूंढ लेते हैं।

इसलिए अगर आपका परिवार या समुदाय उसके वायरस पर मिलकर प्रतिक्रिया नहीं देंगे, तो गुंजाइश मिलने पर भी वे फैल जाएंगे और उसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। जैसा पहले बताया गया है कि प्रकृति रसायन, जीव और भौतिक विज्ञान से बनी है, इसलिए यह इन पर आधारित अनुकूलन को ही इनाम देती है। अगर आपके अनुकूलन की रणनीति विचारधारा या चुनावी साल की राजनीति पर आधारित है, तो यह पूरी निर्ममता से आपका खुलासा कर देगी।

यह सही है कि कोरोना अलग-अलग क्षेत्रों और आबादियों पर अलग तरह से हमला करता है। मिनेसोटा विश्वविद्यालय के एपीडेमिओलॉजिस्ट माइकल ओस्टरहोम ने हाल ही में यूएसए टुडे को बताया- ‘यह वायरस तब तक रहेगा, जब तक हर व्यक्ति को संक्रमित नहीं कर देता या जब तक वैक्सीन या हर्ड इम्युनिटी नहीं मिल जाती’। जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. डेविड कैट्ज़ ने संकट की शुरुआत में ही कहा था कि हमें कुल नुकसान को न्यूनतम रखने के लिए टिकाऊ रणनीति की जरूरत होगी। यानी ऐसी रणनीति जो अधिकतम जिंदगियां और जीविकाएं बचाए।

हम अभी भी अपनी आबादी के अलग-अलग लोगों के अलग-अलग जोखिम स्तरों को पहचानकर सबसे असुरक्षित को बचाने और जिन्हें जोखिम कम है, उन्हें काम पर लौटने देने की रणनीतियां बना सकते हैं। यानी क्या खोलना है और क्या बंद रखना है, इसके बीच सर्वश्रेष्ठ सामंजस्य बैठाना होगा। यह कहना बहुत जल्दबाजी नहीं है कि चीन, जर्मनी, साउथ कोरिया और स्वीडन समेत कई देश जो खुल रहे हैं, वे प्रकृति मां का सम्मान करते हुए, सामंजस्य और विज्ञान को आधार बनाकर खुल रहे हैं।

इनके विपरीत अमेरिका की हालत खराब है। कुछ जगह रेस्त्रां में भीड़ या जिम के लिए प्रदर्शन करते लोग दिख रहे हैं, जिनकी तख्तियों पर लिखा है- ‘मेरी आजादी वहां खत्म नहीं होती, जहां तुम्हारा डर शुरू होता है’। ये तख्तियां लिए लोग और कुछ न्यूज चैनल्स पर इनका उत्साह बढ़ाते मूर्खों को समझ नहीं आ रहा कि हम एक-दूसरे के खिलाफ नहीं खड़े, प्रकृति मां के सामने खड़े हैं। हमें चीजें फिर शुरू करने और अनुकूल बनाने की जरूरत है पर प्रकृति के तर्क का सम्मान करते हुए। उन तरीकों से नहीं जो दूसरी लहर लेकर आएं, जो प्रकृति मां को युद्ध के लिए चुनौती दें। यह समझदारी नहीं है, क्योंकि पिछले 450 करोड़ सालों में प्रकृति मां एक भी युद्ध नहीं हारी है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)



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थाॅमस फ्रीडमैन,  तीन बार पुलित्ज़र अवॉर्ड विजेता एवं ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ में वरिष्ठ स्तंभकार


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