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झुग्गी में रहने वाले बच्चों को स्कूल बुलाने टीचर ने मोबाइल नंबर लिया था, अब उसी पर लेसन भेज देती हैं, कई बार टीचर ही रिचार्ज भी कराती हैं https://ift.tt/2ZR2iYN

'My name is Kareena. I am student of Class 5.. पढ़ना अच्छा लगता है मुझे। मेरी मैम पढ़ाती हैं ऑनलाइन मोबाइल में। .... Early to bed and early to rise....'

दस साल की करीना के पिता मोची हैं और मां मंदिर की सफाई करती हैं। उसका भाई सूरज 6 साल का और बहन काजल 7 साल की है। उत्तर प्रदेश के नोएडा की एक बस्ती में रहने वाले इन बच्चों के पास चिलचिलाती धूप में पहनने के लिए चप्पल भी नहीं, लेकिन पढ़ने का जज्बा जरूर है। ABCD पढ़ना इन्हें पसंद है। और सरकारी स्कूल भले ही बंद हो, लेकिन इनकी टीचर इन्हें वॉट्सऐप के जरिए पढ़ाती हैं।

करीना की मां कविता देवी गरीबी और लॉकडाउन में काम ना होने की मार झेल रही हैं। वो कहती हैं, ‘मैसेज आ जाता है तो बच्चों को दिखा देती हूं और वो काम कर लेती है। उतना पढ़ाई तो नहीं होती लेकिन हल्की फुल्की पढ़ाई हो जाती है।’

करीना कहती हैं, ‘मेरी मैम का नाम अनु शर्मा है। फरवरी से जब हमारा स्कूल चालू था तबसे ही हमारा वॉट्सऐप चालू है। मैम ने सभी बच्चों कानंबर लिया था। इसलिए क्योंकि जो बच्चा स्कूल नहीं आता था उसको वॉट्सऐप करके स्कूल बुला लेती थीं। फिर लॉकडाउन में उसी से ही ऑनलाइन ही पढाने लगीं।’

ये काजल है। इसे अंग्रेजी पढ़ना बहुत पसंद है। लेकिन, इसके पास मोबाइल नहीं है। इसलिए काजल घर पर खुद से ही अंग्रेजी की पढ़ाई करती है।

करीना कहती हैं जैसै वॉट्सऐप पर पढ़ते हैं वैसे ही उस पर एग्जाम भी होती है। करीना ने बताया, ‘आज सीड के बारे में लेसन है। सीड यानी बीज। हम लेसन देखकर कॉपी में उतारते हैं। और फिर उन्हें फोन पर भेजते हैं। दिन में तीन चार लेसन भेजती हैं। जैसे अपोसिट वर्ड ये सब मैम पूछती हैं। तो फिर हम लोग लिखकर कॉपी में उतारकर फिर वॉट्सऐप करके भेज देते हैं।’

हालांकि, काफी बच्चे ऐसे भी हैं जिनके लिए ये विकल्प नहीं। करीना की दोस्त काजल इसी बस्ती में रहती है। उसके पिता एक छोटी से फूलों की नर्सरी में काम करते हैं। वो तीसरी कक्षा में है और अंग्रेज़ी पढ़ना उसे भी पसंद है। काजल कहती है मेरा मोबाइल नहीं है इसलिए मैं नहीं पढ़ पाती। मैं अपने घर में ही खुद से पढाई कर रही हूं।

किसी का मोबाइल फोन ना होना या उसका खराब हो जाना या इंटरनेट ठप्प होना? क्लासरूम से दूर देश के अलग-अलग हिस्सों में लॉकडाउन से प्रभावित गरीब बच्चों की दिक्कतें कई सारी हैं।

झारखंड के देवघर में 11 साल की शिफा मिर्ज़ा सरकारी स्कूल में छठी कक्षा में पढ़ाई कर रही हैं। वो अपनी टीचर के बनाए वॉट्सऐप ग्रुप का हिस्सा तो जरूर हैं, लेकिन फोन में हमेशा रिचार्ज रहे या पिता के पास रिचार्ज के पैसे हो इसकी गारंटी नहीं।

शिफा कहती हैं, ‘कोरोना के चलते मैं स्कूल नहीं जा पाती हूं इसलिए हमारी पढ़ाई रुक गई तो हमें बहुत बुरा लगा। मैम ने हमें वॉट्सऐप ग्रुप में ऐड किया है। मैम हमें वीडियो भेजती हैं। स्कूल के जितने भी शिक्षक हैं, हम उनसे हर विषय पर बात करते हैं। बुरा तब लगता है जब पापा कहते हैं कि रिचार्ज करने के लिए पैसे नहीं है। और तब पढ़ाई रुक जाती है। मेरे घर में टीवी नहीं जो मैं पढ़ाई कर सकूं।’

लॉकडाउन में गरीब बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित हुई है। इनके पास पैरों में पहनने के लिए भले ही चप्पल न हो, लेकिन पढ़ाई करने का जज्बा जरूर है।

20 साल से देवघर में सरकारी स्कूलों में पढ़ा रहीं श्वेता शर्मा कहती हैं, ‘मैं एक सरकारी स्कूल में पढ़ाती हूं, जहां 350 बच्चे हैं। इन बच्चों को पिछले 2-3 महीनों में हमने अपने वॉट्सऐप ग्रुप में जोड़ने का प्रयास किया, लेकिन हम कुछ हद तक ही सफल हो सके हैं। करीब 200 बच्चे इस वक़्त हमारे ग्रुप में जुड़े हैं।’

श्वेता कहती हैं, ‘परेशानी हमारी ये थी कि बच्चों के पास या तो मोबाइल फोन की सुविधा नहीं है या तो इंटरनेट की सुविधा नहीं है। जहां राशन पानी की दिक्कत है वहां उनसे ये मांग करना कि आप फोन खरीदकर उसमें रिचार्ज पैक डलवाए तो वो काफी अनुचित लग रहा था।’

चुनौतियों के बावजूद आज इन्फॉरमेशन कम्यूनिकेशन टेक्नोलॉजी का प्रयोग तमाम राज्यों के कई सरकारी स्कूल बच्चों को उनके घर बैठे ही पढ़ाने के लिए कर रहे हैं। कहीं वेबिनार के जरिए लेक्चर दिए जा रहे हैं, पैरेंट्स टीचर मीटिंग भी हो रही हैं। तो कही डिश टीवी या वेबसाइट जैसे माध्यमों से कुछ स्कूल अपने लेसन टीवी पर दे रहे हैं।

श्वेता कहती हैं, ‘जिन बच्चों के पास मोबाइल फोन थे लेकिन रिचार्ज नही, उनके लिए हमने अपने शिक्षकों से आग्रह किया कि अगर वो बच्चों के डेटा पैक्स की फंडिंग कर सकें। जिन बच्चों के पास मोबाइल नहीं लेकिन टीवी थी, उन्हें दूरदर्शन के माध्यम से जो भी कार्यक्रम आ रहे थे वो हमने दिखाने की कोशिश की।

बच्चे नोट्स की फोटो खींचकर वॉट्सऐप पर ही भेज देते हैं और अगर नोट्स गलत होते हैं, तो मैम फोन पर ही देखकर ठीक करवा देती हैं।

श्वेता इसे लॉकडाउन का सकारात्मक पक्ष मानती हैं कि आज बड़े पैमाने पर दूर-दराज इलाकों में जारी सरकारी विद्यालयों में भी तकनीक की क्रांति देखने को मिल रही हैं।

छोटे गांव, कस्बे हों या दिल्ली जैसे बड़े राज्य। आज ऑनलाइन शिक्षा एक मौका भी है और बड़ी चुनौती भी। खासकर उन पब्लिक स्कूलों के लिए जो निजी स्कूलों जैसी ऊंची फीस नहीं वसूलते। दिल्ली की 1040 सरकारी स्कूलों में 30 जून तक गर्मी की छुट्टियां हैं। लेकिन सातवीं की छात्रा निधि ठाकुर दिल्ली स्थित अपने सरकारी स्कूल की लॉकडाउन में जारी पढाई से खुश हैं।

कहती है, ‘मेरी ऑनलाइन क्लास इस तरीके से फोन पर आती है और हम लोग उसे नोट करते हैं अपनी कॉपी में। फिर हम कॉपी से फोटो भेजते हैं वॉट्सऐप पर और अगर हमने कोई गलत जवाब दिया है तो मैम हमें बताती हैं। कई बार वीडियो के जरिए भी मैम हमें समझाती हैं।’

हर विषय का एक-एक लेसन बच्चों को वॉट्सऐप से लेकर गूगल चैटरूम के ज़रिए करवाया जाता है। लेकिन इसे लेकर निधि की मां सरिष्ठा ठाकुर की अपनी मुश्किलें हैं।

सरिष्ठा कहती हैं, ‘आसानी क्या ये तो मुश्किल है कि बच्चे चौबीस घंटे फोन पर लगे रहते हैं। तो कब तक आंखें ठीक रहेंगी। फोन पर बच्चे बैठते हैं तो कभी गेम खेलने लगते हैं तो कभी कुछ और। ये है कि काम टीचर्स दे रहे हैं तो चल रहा है। लेकिन कहीं छोटे-छोटे मोबाइल हैं, कहीं मोबाइल तो कहीं लैपटॉप नहीं। इंटरनेट भी कभी वीक हो जाता है चाहे कितना भी डाटा डलवाएं।

ऑनलाइन पढ़ाई पर मांओं की अपनी चिंता भी अलग है। उन्हें डर है कि सारा दिन फोन पर लगे रहने से कहीं बच्चों की आंखें खराब न हो जाएं।

बारहवी की परीक्षा दे चुकीं मुक्ता बताती हैं,13 साल के भाई कनव की सातवीं की पढाई शुरू हुई है. लेकिन क्लास के 54 छात्रों में सिर्फ आधे ही बच्चे वॉट्सऐप पर जुड़े हैं। टीचर वीडियो कभी-कभी भेजते हैं, बच्चे उन्हें डाउनलोड करके उन्हें रट लेते हैं, लेकिन उन्हें कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है। बच्चे कॉपी कर रहे हैं। मेरे भाई बहन को खुद कोई टेंशन नहीं है।

कोरोनावायरस से आज दुनिया का कोई भी सेक्टर अछूता नहीं हैं। शिक्षा की बात करें तो बच्चे, टीचर, मां-बाप कई दिक्कतों से घिरे हैं।

क्लासरूम में बच्चों के लौटने पर उनकी सेहत को खतरे के से जुड़े कई तरह के विचार और तर्क हैं। लेकिन इन सबके बावजूद आज फेक न्यूज के लिए बदनाम वॉट्सऐप यूनिवर्सिटी कई नन्हें मासूमों की शिक्षा का एक विकल्प भी बना है। और आने वाले दिनों में सरकारों को कोशिश करनी होगी कि हर बच्चे के परिवार तक फोन और रिचार्ज की कोई सुविधा पहुंच सके ताकि कोविड की मार मासूमों की शिक्षा पर भारी ना पड़े।



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लॉकडाउन में टीचर वॉट्सऐप पर बच्चों को पढ़ाती हैं। ये बच्चे पढ़ाई करने के बाद टीचर को वॉट्सऐप पर ही चेक कराते हैं।


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