Skip to main content

पुलिस ने कई बार समझाया कि यहां से कोई बस नहीं चलेगी, लेकिन लोगों को अफवाह पर ही भरोसा है, वो घर पहुंचने की उम्मीद देती है https://ift.tt/3e1qxHQ

चिलचिलाती धूप में सैकड़ों लोग नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के बाहर कतारबद्ध खड़े हैं। इस उम्मीद के साथ कि कोई ट्रेन आएगी और इन्हें इनके घर तक पहुंचा देगी। कुछ लोगों को बिहार जाना है, कुछ को पूर्वी उत्तर प्रदेश और कुछ को बंगाल। तपती गर्मी में ये लोग कई घंटों से सिर्फ इसलिए खड़े हैं क्योंकि इन्होंने उड़ती-उड़ती ख़बर सुनी है कि यहां से अलग-अलग राज्यों के लिए गाड़ियां चल रही हैं।

इसी कतार में विजय कुमार भी अपने छह साथियों के साथ खड़े हैं। ये सभी बेलदारी करते हैं और दिल्ली के उत्तम नगर इलाके में रहते हैं। इन लोगों ने भी सुना ही है कि रेलवे स्टेशन से गाड़ियां चल रही हैं। लिहाज़ा सुबह पांच बजे अपने घरों से निकल कर, पांच घंटे पैदल चलने के बाद ये लोग नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंचे हैं।

विजय बताते हैं, ‘हमें सुल्तानपुर जाना है। यहां मज़दूरी करते थे और घर पैसा भेजते थे। लेकिन लॉकडाउन के बाद उल्टा करना पड़ रहा है। हमें घर से पैसा मांगना पड़ रहा है। तीन बार पैसा मंगा चुके हैं लेकिन अब नहीं हो पा रहा इसलिए लौट रहे हैं। किसी ने बताया था कि यहां से शायद बस मिल जाए। ट्रेन तो सिर्फ अमीरों के लिए चल रही है। हमें तो स्टेशन के अंदर भी नहीं घुसने दे रहे।’

दिल्ली स्टेशन के बाहर दो तस्वीरें देखने को मिलती हैं। एक मजदूर हैं, जिनके पास टिकट नहीं है। और दूसरी तरफ ऐसे लोग हैं जो मर्सिडिज से उतरकर ई-टिकट दिखाकर अंदर चले जाते हैं।

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर लोग दो बड़े समूहों में बंट गए हैं। एक तरफ वो लोग हैं जो एक-एक कर अपनी निजी कारों से उतर रहे हैं, अपने ट्रॉली बैग लेकर स्टेशन की तरफ बढ़ रहे हैं और ई-टिकट दिखाकर स्टेशन में दाखिल हो रहे हैं। दूसरी तरफ विजय जैसे सैकड़ों लोगों का समूह है जो तपती धूप में कपड़ों की गठरी बांधे हुए पहाड़गंज के बसंत रोड की तरफ जमा हुआ है और रेलवे स्टेशन की तरफ टकटकी लगाए हुए है। इन लोगों के पास चूंकि ई-टिकट नहीं है लिहाज़ा इन्हें स्टेशन में दाख़िल होने की इजाजत नहीं है।

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से सिर्फ़ राजधानी ट्रेन चलाई जा रही हैं। सुबह साढ़े ग्यारह से शुरू होकर रात के सवा नौ बजे तक 11 राजधानी ट्रेनें आज देश के अलग-अलग हिस्सों के लिए यहां से निकल रही हैं। और इन ट्रेनों के टिकट सिर्फ ऑनलाइन ही बुक हो रहे हैं। ऐसे में मजदूर वर्ग के लिए इन ट्रेनों के दरवाजे बंद हो गए हैं क्योंकि न तो इस वर्ग के पास ऑनलाइन टिकट बुक करने के संसाधन हैं और न ही इसकी समझ।

पहाड़गंज में परांठों का ठेला लगाने वाले मुजीब उल कहते हैं, ‘मुझे ऑनलाइन टिकट बुक करना नहीं आता। लेकिन एक भतीजा है मेरा जो कॉलेज तक पढ़ा है। उसे मैंने कहा था दिल्ली से कटिहार (बिहार) का टिकट बुक करने को। वो बोला कि चाचा बिहार की टिकट ऑनलाइन भी नहीं मिल रही है। घर जाने के लिए हम महंगी टिकट खरीदने को भी तैयार हैं लेकिन टिकट किसी भी तरह नहीं मिल रही।’

रेलवे स्टेशन के गेट के पास ही हिंदू महासभा के नेता बीएस मुंजे की मूर्ति। इस मूर्ति के नीचे आजकल प्रवासी मजदूरों ने बैठने का ठिकाना बना लिया है।

दिल्ली से जो राजधानी ट्रेनें चल रही हैं उनमें जम्मू या गुजरात जाने वाली ट्रेनों के ऑनलाइन टिकट तो आसानी से उपलब्ध हैं लेकिन बिहार, उत्तर प्रदेश और बंगाल की तरफ जाने वाले यात्रियों की संख्या इतनी ज़्यादा है कि यहां के टिकट ऑनलाइन भी उपलब्ध नहीं हो पा रहे। लिहाज़ा मजदूर वर्ग के जो लोग इन ट्रेनों का किराया चुकाने को तैयार भी हैं, उन्हें भी यह टिकट नसीब नहीं हो रहे।

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के गेट के पास ही बनी हिंदू महासभा के नेता बीएस मुंजे की एक मूर्ति के नीचे निढाल होकर बैठे 60 साल के राम किशन कहते हैं, ‘काउंटर खुल जाते तो हम 30-40 घंटे भी लाइन में खड़े रहकर टिकट खरीद लेते। लेकिन काउंटर पर टिकट मिल ही नहीं रहे और ऑनलाइन टिकट करना हमें नहीं आता। ऐसे में क्या करें कुछ समझ नहीं आ रहा। अब यहीं पड़े रहेंगे जब तक कोई व्यवस्था नहीं हो जाती।’

दिल्ली से कई श्रमिक ट्रेनें भी देश भर के लिए चलाई जा रही हैं। लेकिन इनमें भी टिकट मिलना आसान नहीं है। ट्रेन की उम्मीद में फ़रीदाबाद से नई दिल्ली पहुंचे 56 वर्षीय अरविंद कुमार एक काग़ज़ दिखाते हुए कहते हैं, ‘हमने एक साहब से कहकर श्रमिक ट्रेन के लिए नाम लिखवाया था। उन्होंने ये काग़ज़ भी दिया है। लेकिन कई दिन बीत जाने तक भी उधर से कोई फ़ोन नहीं आया।’ जो काग़ज़ अरविंद दिखा रहे हैं उस पर अंग्रेज़ी में लिखा है, ‘हरियाणा से अन्य राज्यों में जाने की अनुमति के लिए गृह मंत्रालय में पंजीकरण करने का धन्यवाद।’

पुलिस दिन में कई बार इन मजदूरों को समझाती रहती है कि यूपी-बिहार के लिए कोई ट्रेन नहीं चलेगी। फिर भी ये लोग मानने को तैयार नहीं हैं।

ऐसे दर्जनों लोग यहां मौजूद हैं जिन्होंने अपने निकटतम थानों में जाकर श्रमिक ट्रेन में सफ़र करने के लिए पंजीकरण करवाया है। लेकिन इन सभी लोगों की शिकायत है कि पंजीकरण करवाए हफ़्ते भर से ज़्यादा हो चुका है लेकिन थाने से वापस कोई फ़ोन नहीं आया। अरविंद कुमार कहते हैं, ‘जब हम थाने में पता करने गए तो उन्होंने कहा कि अब वो प्रक्रिया बंद हो गई है। जब ट्रेन चलेगी तो बता दिया जाएगा। फिर किसी ने कुछ नहीं बताया।’

रेलवे ने राजधानी ट्रेन और श्रमिक ट्रेनों के स्टेशन भी अलग-अलग कर दिए हैं। नई दिल्ली के चमचमाते रेलवे स्टेशन से सिर्फ़ राजधानी ट्रेनें चलाई जा रही हैं और पुरानी दिल्ली के जर्जर स्टेशन से श्रमिक ट्रेनें। लेकिन फिर भी सैकड़ों ऐसे मज़दूर नई दिल्ली स्टेशन पहुंच रहे हैं जिन्हें श्रमिक एक्सप्रेस में जगह नहीं मिल रही।

मज़दूरों के रेलवे स्टेशन पहुंचने का ये सिलसिला उसी दिन से शुरू हो चुका है जिस दिन से ट्रेन चलना शुरू हुई हैं। हर सुबह सैकड़ों मज़दूर रेलवे स्टेशन पहुंचना शुरू होते हैं और शाम होने तक स्थानीय प्रशासन इन्हें बसों में बैठाकर पास के किसी सरकारी स्कूल, किसी सराय, किसी रैन बसेरे या किसी ऐसे मैदान में छोड़ आता है जहां इनके रहने-खाने की न्यूनतम सुविधा उपलब्ध हो। ऐसी ही बसों में लोगों को बैठते देख इन लोगों ने मान लिया है कि शायद बसों से लोगों को अलग-अलग राज्यों तक छोड़ा जा रहा है।

साठ साल के दया शंकर गुप्ता भी इसी उम्मीद में यहां बैठे हैं। वो कहते हैं, ‘मैं पहाड़गंज में रुई के गद्दे बनाने वाली दुकान में काम करता हूं। महीने का 12 हज़ार मिलता था लेकिन जब से लॉकडाउन हुआ तब से अब तक मालिक ने कुल 1700 रुपए दिए हैं। मालिक कहता है दुकान बंद है तो मैं भी पैसा कहाँ से दूं। अब खाने को भी पैसा नहीं है इसलिए घर जा रहा हूं। सुना है यहां से उत्तर प्रदेश और बिहार के लिए बस चलती हैं।’

बस चलने की उम्मीद में जो लोग सुबह से लाइन बनाकर खड़े थे, शाम होने तक उसी जगह पर बैठ गए हैं। भारी असुविधा में बैठे इन सैकड़ों मज़दूरों के ठीक सामने ही दिल्ली पुलिस का एक ‘सुविधा केंद्र’ है। वहां से पुलिस ने कई बार आकर इन्हें समझा दिया है कि कोई भी बस उत्तर प्रदेश या बिहार के लिए नहीं चलने वाली लेकिन लोग ये मानने को तैयार नहीं हैं। इन लोगों को उस अफ़वाह पर ही ज़्यादा विश्वास है जिससे इन्हें घर पहुंच जाने की उम्मीद मिल रही है।

दिनभर ये मजदूर ट्रेन के इंतजार में स्टेशन के बाहर बैठे थे और शाम होते ही पुलिस ने इन्हेंमौलाना आज़ाद राष्ट्रीय कौशल अकादमी के अंदर लाकर बैठा दिया।

यहां मौजूद दिल्ली पुलिस के सब इन्स्पेक्टर ललित कुमार कहते हैं, ‘हमारे कई बार समझाने पर भी ये लोग फिर नहीं मान रहे। इन्हें अफ़वाह पर ही ज़्यादा भरोसा है। ऐसी अफ़वाहों तो तोड़ने का एक ही तरीक़ा है - लट्ठ। अभी दो लोगों को लट्ठ पड़ जाएगा तो बाक़ी सब भाग जाएंगे और तुरंत बात भी सबमें फैल जाएगी कि यहां से कोई गाड़ी नहीं चल रही बल्कि लट्ठ चल रहे हैं। फिर कोई अफ़वाह नहीं फैलेगी। लेकिन हम लट्ठ नहीं चला सकते, ये लोग भी परेशान ही हैं।’

शाम के सात बजे तक स्थानीय पुलिस ने इन लोगों को हिंदू महासभा के नेता बीएस मुंजे की मूर्ति के नीचे से उठाकर ‘मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय कौशल अकादमी’ के भीतर बैठा दिया है। इनमें कई लोग केंद्रीय दिल्ली के नबी करीम इलाक़े से भी आए हैं। नबी करीम वह इलाक़ा है जहां कोरोना के कई मामलों की पुष्टि हो चुकी है। सम्भव है कि इनमें भी कुछ लोगों को कोरोना संक्रमण हो लेकिन फ़िलहाल इनमें से किसी के लिए भी यह चिंता का विषय तक नहीं है। सब लोग एक पार्किंग शेड ने नीचे ग़रीबी और मजबूरी की समान डोर से बंधे हुए एक साथ बैठ गए हैं।

विजय कुमार कहते हैं, ‘सुबह तक इंतज़ार करेंगे। कुछ इंतज़ाम हुआ तो ठीक, नहीं तो हम भी पैदल ही निकल जाएंगे। जब हमारे लिए ट्रेन नहीं हैं, बस नहीं हैं तो और क्या करें?’ ट्रेनें चलने के बाद भी ये मज़दूर पैदल क्यों जा रहे हैं? यह सवाल करने वालों को शायद नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर बैठे इन लोगों की व्यथा जानकर जवाब मिल जाए कि आख़िर मार्च से हुआ मज़दूरों का पैदल मार्च ख़त्म क्यों नहीं हो रहा।



आज की ताज़ा ख़बरें पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर ऍप डाउनलोड करें
रेलवे स्टेशन के बाहर मजदूर अपना सामान लेकर ट्रेन आने की उम्मीद में बैठे हैं। इन मजदूरों को बस घर जाने की चिंता है।


from Dainik Bhaskar https://ift.tt/2TgUewz

Comments

Popular posts from this blog

Who is Nicole Osbourne? Inside Anthony Joshua’s split and co-parenting https://ift.tt/jrKHYQR

Boxer Anthony Joshua's personal life draws attention. His son's mother, Nicole Osbourne, a dancer and yoga instructor, shares co-parenting duties. They maintain a respectful relationship focused on their son Joseph. Joshua's career demands often kept him away, contributing to their split. He remains dedicated to fatherhood amidst ongoing boxing discussions. from Times of India https://ift.tt/IxmCXUE