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लॉकडाउन में सब कुछ खोकर घर लौटते मजदूर, बच्चे और सड़कों पर संघर्ष करती जिंदगी का आंखों देखा हाल https://ift.tt/3fNCSkx

लॉकडाउन मजदूरों पर सबसे ज्यादा भारी पड़ रहा है। फैक्ट्री, कंपनियों में काम धंधे बंद होने से भूखे मरने की नौबत आने पर बड़ी संख्या में हजारों मजदूर घरों को लौट रहे हैं...न तो पैसा बचा है, न खाने के लिए कुछ है...लिहाजा ज्यादातर पैदल हैं...देश के हर हाईवे पर ये हजारों किमी का सफर तय करते दिख रहे हैं...जब भास्कर ने हाल जानने की कोशिश की, तो भयावह और दर्दनाक तस्वीरें सामने आईं...जानिए जिंदगी के सफर का एक अहम हिस्सा सड़कों पर पूरा करने को मजबूर ऐसे ही कुछ मजदूरों की दास्तां-

1.बिहार: ट्रक की टक्कर से पति का पैर टूटा, मदद के लिए राेती-गिड़गिड़ाती रही पत्नी
मुजफ्फरपुर
सेशिशिर कुमार...पूर्णिया जिले की मुख्तारा खातून शुक्रवार सुबह सादातपुर में लखनऊ-मुजफ्फरपुर हाईवेकिनारे राेती दिखीं। जब भास्कर संवाददाता ने पूछा, ताे फफक पड़ी। बताया- ‘डेढ़ माह तक पानी बिस्किट पर जिंदगी कटी। मजदूरी करते थे। अचानक कर्फ्यू लग गया। क्या खाते? साथ काम करने वाले पैदल ही निकलने लगे, तो हम भी चल दिए। खुद किसी तरह भूखे रह लिए, बच्चे भूख से रोते-रोते बेसुध हो सो जाते, तो कलेजा फट जाता। कई दिनों तक एक रोटी के चार-चार टुकड़े कर पानी में भिगो कर बच्चों काे खिलाया।’

मुख्तारा की यह पीड़ा काेराेना के कारण मजदूरी पर आए संकट की कहानी है। एक कामगार की पत्नी की बेबसी है और एक मां की दारुण कथा भी है। पर परेशानियां अभी शुरू हुई थी, मुख्तारा के सामने पति नूरजामी बेहोश पड़ा था। कपड़े से ढंका हुआ। गुड़गांव से लौटते वक्त लखनऊ के पास ट्रक ने नूरजामी काे टक्कर मार दी, जिससे उसका पैर टूट गया। कई बार गिड़गिड़ाने पर भी मदद नहीं मिली। आखिरकार एक गिट्टी लदे ट्रक वाले ने बैठा लिया। बाद में ऑटो से पूर्णिया जा रही रुखसार ने मदद की और ऑटो इन्हें देकर खुद एक ट्रक पर सवार होकर परिवार के साथ पूर्णिया के लिए निकल गई।

मुख्तारा की यह पीड़ा काेराेना के कारण मजदूरी पर आए संकट की कहानी है।

2. रायपुर: अब तो पत्थर पर भी नींद आ जाती है
इन तस्वीरों को देखना दर्द पैदा करता है, लेकिन सच्चाई यही है। जितने भी मजदूर एक जगह से दूसरी जगह जा रहे हैं, उनके बच्चों के चेहरे मुरझाए और आंखें सूखे हुए दिखेंगे...आखिर दर्द बयां भी किससे करें...तस्वीर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की है...यह बच्चा पत्थर पर बैठा था...मां की गोद की आदत तो जैसे छूट गई...अब तो पत्थर पर भी नींद आ जाती है। छत्तीसगढ़ से भी मजदूर महाराष्ट्र से निकलकर ओडिशा, बिहार, झारखंड जाने के लिए निकले हैं।

थकान से टूटा बदन जब जवाब दे गया, तो टाटीबंध के पास बैठ गए। चेहरे पर दर्द, बेबसी, मायूसी, मजबूरी ओढ़े हुए ये बस चले जा रहे हैं। कहते हैं कि सबकुछ सहन हो जाता है, लेकिन बच्चों के चेहरे देख रोना आता है। कभी दूध मिल जाता है, तो कभी भूखे ही चलते रहना पड़ता है। बच्चों का सफर भी ऐसा कि कभी मां की गोद सफर का सहारा बनती है, तो कभी पिता की अंगुली और कंधे...कभी पत्थर भी। सफर जारी है...

कभी मां की गाेद में सोने वाले बच्चे अब पत्थर पर ही सोने को मजबूर हैं।

3. भरतपुर: बेबस पिता ने दिव्यांग बेटे को 1150किमी ले जाने को साइकिल चुराई

एक बेबस और मजलूम पिता की मजबूरी कैसे ईमान को डिगा देती है...कैसे उसे कसूरवार बना देती है...इसे बरेली के मोहम्मद इकबाल की इस चिट्ठी से महसूस किया जा सकता है। इकबाल का कसूर इतना है कि उसने दिव्यांग बेटे को 1150 किमी दूर ले जाने के लिए साइकिल चुरा ली...लेकिन दूसरी तरफ साइकिल मालिक के नाम चिट्ठी भी लिखी, जिसमें लिखा कि मैं आपका कसूरवार हूं, लेकिन मजदूर हूं और मजबूर भी। मैं आपकी साइकिल लेकर जा रहा हूं। मुझे माफ कर देना...
रारह गांव के सहनावली में रहने वाली साइकिल मालिक साहब सिंह को बरामदे से साइकिल गायब होने का पता चला। सफाई के वक्त कागज का छोटा सा टुकड़ा मिला, जिस पर इकबाल ने अपना दर्द लिखा था। साहब सिंह बताते हैं- "इकबाल की चिट्ठी से आंखें भर आईं। साइकिल चोरी हो जाने का जो आक्रोश और चिंता थी, वह अब संतोष में बदल गई है। मेरे मन में इकबाल के प्रति कोई द्वेष नहीं है, बल्कि यह साइकिल सही मायने में किसी के दर्द के दरिया को पार करने में काम आ रही है। इकबाल ने बेबसी में यह दुस्साहस किया, जबकि बरामदे में और भी कई कीमती चीजें पड़ी थीं, लेकिन उन्हें हाथ नहीं लगाया।'
मोहम्मद इकबाल कहां से आया था..क्या करता था...कौन साथ था...बरेली में कहां जाना था...इसका कोई पता नहीं चल सका। लेकिन वह हजारों मजदूरों में से एक हैं, जो रोजी-रोजी छिनने के बाद इन दिनों अपने गांव, शहर में अपने घर पहुंचने की जद्दोजहद में हैं।

इकबाल ने साइकिल मालिक के नाम चिट्ठी भी लिखी, जिसमें लिखा कि मैं आपका कसूरवार हूं, लेकिन मजदूर हूं और मजबूर भी।

(डिस्क्लेमरः दैनिक भास्कर किसी भी परिस्थिति में चोरी अथवा अन्य गैर-कानूनी काम या ऐसी किसी भी घटना को मान्यता नहीं देता है)

4. अहमदाबाद: घर लौटने से पहले कर्मभूमि को नमन, इस वादे के साथ कि जल्द लौटेंगे
अमराईवाड़ी में रहने वाली कृष्णादेवी परिवार के साथ रायबरेली रवाना हुईं। इस दौरान उन्होंने स्टेशन पर ही जमीन की पूजा-अर्चना कर कर्मभूमि अहमदाबाद के प्रति कृतज्ञता जताई। कृष्णादेवी ने बताया- गुजरात ने बहुत कुछ दिया है, पर अभी मजबूरी है, इसलिए जा रहे हैं, पर मैं यह जरूर कहना चाहती हूं कि हम जल्द गुजरात लौटेंगे।

कृष्णादेवी ने बताया- गुजरात ने बहुत कुछ दिया है, पर अभी मजबूरी है, इसलिए जा रहे हैं।

5. मुजफ्फरपुर:दर्द की आह- 7 दिन से पैदल, छालों के दर्द से रो पड़ा 17 साल का श्रवण

यह 17 साल का श्रवण कुमार है...संघर्ष भी नाम के मुताबिक ही कर रहा है। हरियाणा के गुड़गांव में सिलाई-कढ़ाई करने वाला श्रवण कंधे पर बैग टांगे पैदल ही 1000 किमी से ज्यादा के सफर पर है। पैदल चलते-चलते रास्ते में दिखने वाले ट्रक, ट्राला और अन्य वाहनों से हाथ हिलाकर मदद मांगता, लेकिन सब अपने-अपने रास्ते निकल जाते और श्रवण वहीं छूट जाता। 7 दिन पैदल चलकर इतना थक चुका है कि पांव एक कदम आगे बढ़ने को तैयार नहीं। बढ़ने की कोशिश करता है तो पांव के छाले तड़पा देेते हैं। हाल पूछने पर फफक-फफक कर रो पड़ता है।

बताता है- ‘6 हजार रुपए महीना मिलता था। काम-धंधा बंद हो गया तो मजदूर पिता ने गांव से कुछ पैसे भेजे, जो जल्द खत्म हो गए। मकान मालिक ने भी दो महीने का किराया लेकर जाने को कह दिया। बस, अब जल्द घर पहुंचना है।’

हरियाणा के गुड़गांव में सिलाई-कढ़ाई करने वाला श्रवण कंधे पर बैग टांगे पैदल ही 1000 किमी से ज्यादा के सफर पर है।

6. नंगे पैर भविष्य... 5 साल का राहुल पिता के साथ नंगे पैर 700 किमी के सफर पर
भोपाल से विशाल त्रिपाठी...

सुबह के सवा छह बज रहे हैं। सड़क अभी से गर्म होने लगी है...तभी 5 साल का राहुल नजर आता है...नंगे पैर। साथ में माता-पिता भी हैं। न गर्म सड़क से बचने का कोई उपाय और न तेज धूप से बचने का जतन...। उसे तो शायद यह भी पता नहीं कि वह किस मंजिल की तरफ और क्यों जा रहा है...लेकिन इतना जरूरी जानता है कि मिस्त्री का काम करने वाले पिता अविनाश दास सब कुछ समेटकर कहीं जा रहे हैं।

अविनाश भोपाल के बंजारी इलाके में मिस्त्री का काम करते थे। लॉकडाउन में सबकुछ बिखर गया। कभी थाने, तो कभी नगर निगम के चक्कर काटे। कोई मदद नहीं मिली, तो पैदल ही छत्तीसगढ़ के अपने गांव मुंगेली के लिए निकल पड़े। न तो पैसे बचे हैं और न ही खाने-पीने का कोई सामान। अविनाश की पत्नी कहती हैं- हम गरीबों के लिए सरकार के पास है ही क्या...कुछ होता, तो घर पहुंच जाते।

अविनाश की पत्नी कहती हैं- हम गरीबों के लिए सरकार के पास है ही क्या...कुछ होता, तो घर पहुंच जाते।

7. कोरोना से जंग लड़ रहा 10 दिन का नवजात, नर्स ही बन गईं मां
नाशिक से अशोक गवली...

कोरोना से जंग पूरी दुनिया में लड़ी जा रही है लेकिन महाराष्ट्र के नासिक में एक अलग ही लड़ाई चल रही है। जिला अस्पताल में 10 दिन के नवजात को कोरोना पॉजिटिव निकला है, जबकि उसकी मां की रिपोर्ट निगेटिव आई है। ऐसे में मां-बेटे को अलग रखा गया है। डॉक्टर और नर्स ही सुरक्षा कवच पहनकर उसकी देखभाल कर रहे हैं। विंचूर इलाके की महिला ने 5 मई को बेटे को जन्म दिया। 11 मई को मां निगेटिव और नवजात पॉजीटिव निकला। तत्काल उसे मां से अलग किया गया।

मां उसे छोड़ने को तैयार नहीं थी, तब डॉक्टरों और नर्सों ने भरोसा दिलाया कि बच्चे की देखरेख में कोई कमी नहीं होगी। बच्चे की देखभाल कर रही क्रांति शिरसाट ने कहा कि हम बखूबी ध्यान रख रहे हैं। उसे मां का दूध ही पिला रहे हैं।मां को वीडियो कॉलिंग पर बच्चे को दिखा रहे हैं। डॉ. सुरेश जगदाले ने बताया कि पहले चार दिन तक नवजात ने मां का दूध पिया लेकिन रिपोर्ट पॉजीटिव आने के बाद सब बदल गया। उसे मल्टीविटामिन सीरप और अन्य औषधियां भी दी जा रही है। 14 दिन बाद फिर नमूना लेंगे और रिपोर्ट निगेटिव आने पर डिस्चार्ज किया जाएगा।

बच्चे को कोरोना की वजह से उसे मां से अलग रखा गया है।


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मुख्तारा ने बताया- ‘हालात इतने बुरे थे कि एक रोटी के चार-चार टुकड़े कर और उन्हें पानी में भिगो कर बच्चों काे खिलाया।’


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