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कोरोना से 50 गुना अधिक मारक महामारी फैली तो क्या होगा; संक्रमण कहीं कम तो कहीं ज्यादा क्यों, ऐसे कई सवालों के जवाब जरूरी: रेटक्लिफ https://ift.tt/38h5krJ

2019 में चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार पाने वाले डॉक्टर पीटर रैटक्लिफ नेफ्रोलॉजिस्ट (किडनी विशेषज्ञ) हैं। वे ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के रिसर्च स्कॉलर व फ्रांसिस क्रिक इंस्टीट्यूट के क्लीनिकल रिसर्च डायरेक्टर हैं। आज नेशनल डॉक्टर्स डे पर भास्कर के रितेश शुक्ल ने उनसे विशेष बातचीत की। उन्होंने कोरोना महामारी और भविष्य से जुड़े गंभीर सवालों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि डब्ल्यूएचओ को खत्म नहीं किया जा सकता, उसे अपना तरीका बदलना होगा। इसके लिए राजनीति और नेताओं में सहमति जरूरी है। पढ़िए उनसे बातचीत के संपादित अंश...

जब मुझे नोबेल पुरस्कार मिला तो इतने कॉल आने लगे कि अचानक लगा कि मैं कोई महान आत्मा हूं। यहां तक कि मेरे बच्चों ने भी मुझे आदर भाव से देखा। हमारे इस पेशे की खास बात ये है कि मरीजों को देखने और रिसर्च में समय निकल जाता है। शरीर के कलपुर्जे क्यों अपना काम करने में सुस्त पड़ जाते हैं और कैसे इन्हें दोबारा चुस्त बना दिया जाए, यह यात्रा अपने आप में आनंददायक है। यही भावना एक डॉक्टर को डॉक्टर बनाती है। मौजूदा कोरोना का दौर यह बताता है कि हमें भविष्य में क्या होगा, इसकी तैयारी पहले से करनी होगी। इसमें सबसे बड़ी बाधा यह है कि इस दुनिया में उद्दंडता की हद तक प्रश्न पूछना फैशन के खिलाफ माना जाता है।

समाज में हर बात को मानना, कोई प्रश्न न उठाना फैशन है और इसीलिए अधिकतर लोग कोई खोज नहीं करते और योजनाएं पूरी न होने पर परेशान हो जाते हैं। समाज में हमें एक संतुलन चाहिए, दो किस्म के लोगों में। एक वो हैं जो मान्यताओं को तोड़ते हैं और असहनीय लेकिन उपयोगी प्रश्न उठाते हैं। दूसरे वो, जो फैशन से जुड़कर अपना जीवन बिताते हैं। दूसरा यह कि निर्णय लेने पर हम जरूरत से ज्यादा जोर देते हैं, पर निर्णय लेने के बाद क्या करना है, उस पर ध्यान नहीं देते। ये बात मैं इसलिए बता रहा हूं, क्योंकि हम जो निर्णय लेते हैं, जो योजनाएं बनाते हैं, जरूरी नहीं कि वो पूरी हों।

मसलन, पुरस्कार की घोषणा के बाद मेरे 300 कार्यक्रम तय हो गए। लेकिन अचानक कोरोना के चलते ये सभी टल गए। अब कोरोना काल में प्रश्न ये है कि भविष्य में अगर इससे बड़ी महामारी आई, जिसमें मृत्युदर कोरोना से 50 गुना ज्यादा हो, तो क्या किया जाएगा? क्यों भारत में कोरोना संक्रमण से होने वाली मृत्युदर कम है, लेकिन इटली या स्पेन में अधिक है।

वैक्सीन कब बनेगी?

इन प्रश्नों के उत्तर इस पर निर्भर करते हैं कि मानव शरीर पर कितने परीक्षण हो रहे हैं। हमें ये नहीं पता है कि ये बीमारी सीधे खून पर असर करती है या किसी रिएक्टिव माध्यम से खून में पहुंचती है। जब तक इस बात का पता नहीं चलेगा तब तक विश्वसनीय वैक्सीन या दवा बनाने में दिक्कतें आएंगी। कोरोना के केस में मेरा मानना है कि हाइपोक्सिया पर स्टडी तेज करने की जरूरत है। हाइपोक्सिया वह परिस्थिति होती है, जब जरूरत जितना ऑक्सीजन शरीर के टिश्यूज तक नहीं पहुंच पाता। इससे वेंटिलेटर की जरूरत कम की जा सकती है।

मेरे हिसाब से एल्मिट्रीन दवा, जिसे एक फ्रेंच कंपनी बनाती है, उसका ट्रायल शुरू करना चाहिए। यह फेफड़ों की बीमारी की दवा है लेकिन इसका इस्तेमाल रोक दिया गया। ट्रायल से कोविड मामलों में इसकी उपयोगिता का पता लगाया जा सकता है। अंतत: परीक्षण के बिना ऐसे सवालों का उत्तर नहीं मिल सकता। चिकित्सा समुदाय, मेडिकल टेक्नोलॉजी को सारा ध्यान इनका उत्तर ढूंढने में लगा देना चाहिए।

ऑफिसों में कार्यप्रणाली क्या होगी?

अगर महामारी का खतरा बना हुआ है तो फिर ऑफिसों में कार्यप्रणाली क्या होगी? ऐसे ही बिल्डिंग डिजाइन, फायर रेगुलेशन इत्यादि जैसे विषयों पर भी पुनर्विचार करने की आवश्यकता है, ताकि भविष्य में महामारी के दौरान जान-माल को बचाया जा सके। आज वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन जैसे वैश्विक संस्थानों पर भी कोरोना काल में आरोप लगने लगे हैं।

मैं ये नहीं कहूंगा कि अब डब्ल्यूएचओ की जरूरत नहीं है, लेकिन इनके काम करने के तरीके में बदलाव की आवश्यकता है। राजनीतिक निर्णयों में सामंजस्य नहीं है। राजनीति अपने हितों को ध्यान में रखकर निर्णय करती आई है, जबकि कोरोना महामारी ने साफ कर दिया है कि अब राजनीतिक निर्णय दुनियाभर के लोगों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

केमिस्ट्री पढ़ना था, शिक्षक बोले- मेडिसिन पढ़ो
जब मैं कॉलेज में दाखिला ले रहा था, तो केमेस्ट्री लेना चाहता था। लेकिन मेरे हेड मास्टर के कहने पर मेडिसिन ली। न उन्होंने कुछ समझाने की कोशिश की और न ही मैंने कोई सवाल किए। मैंने उनके कहने पर चुना और आज मुझे अपना काम बहुत पसंद है। मुझे लगता है कि ये निर्णय करना ज्यादा जरूरी है कि आप क्यों कुछ करना चाहते हैं, तब आप यह तय कर पाएंगे कि आप क्या करना चाहते हैं।



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पीटर रैटक्लिफ ने कहा कि डब्ल्यूएचओ को खत्म नहीं किया जा सकता, उसे अपना तरीका बदलना होगा। इसके लिए राजनीति और नेताओं में सहमति जरूरी है। (फाइल)


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