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अक्षम सरकार और आलसी विपक्ष के बीच हमारी अर्थव्यस्था बर्बाद हो रही है, स्थिति नहीं सुधरी तो हम नए ‘अछूत’ बन जाएंगे https://ift.tt/3dgfxWa

सदियों से अस्पृश्यता हमारे देश के लिए कलंक रही है। इससे जीवनभर लड़ने वाले अम्बेडकर ने दावा किया था कि इस बात के पर्याप्त सबूत है जो बताते हैं कि यह 400 ईसा पूर्व से चली आ रही है और यह हमेशा से ही भारतीयों के जीने का तरीका रही है।

यही वजह है कि एक तरफ धर्मनिष्ठ हिन्दू और दूसरी तरफ प्रतिबद्ध समावेशनवादी गांधी मानते थे कि इस घातक प्रथा को खत्म करना हमारे लिए ही अच्छा है। और सामाजिक न्याय पर भरोसा रखने वाले नेहरू ने कहा था कि जब तक हम जाति व्यवस्था खत्म नहीं करते और सभी भारतीयों के लिए समानता सुनिश्चित नहीं करते, भारत कभी अपनी सच्ची ऊंचाई तक नहीं पहुंच पाएगा।

यह वजह है कि हमारे संविधान ने अस्पृश्यता को गैर-कानूनी बनाया। काननू बनाने इस दंडनीय अपराध बनाया गया। लेकिन क्या यह खत्म हुई? नहीं। अस्पृश्यता हमारी सोच में बहुत गहराई तक समाई है और खुलेआम नजर आ जाती है। इसकी बदसूरती हाल ही में बढ़ी ही है, जिसे कुछ राजनैतिक पार्टियों ने बढ़ावा दिया है, जो निर्दयी बहुसंख्यवाद को पाने के लिए इसे जिंदा रखना चाहते हैं।

अब सिर्फ निचली जातियां, दलित ही इससे पीड़ित नहीं हैं। भारत के कुछ हिस्सों में किसी समुदाय विशेष के गरीब लोग नए अछूत बन गए हैं। तो कुछ हिस्सों में कुछ जनजातियां नई अछूत हैं, जिन्हें उनसे जमीन, जंगल और खनिज संपदा हथियाने के लिए सरकारों ने हाशिये पर छोड़ दिया है।

और अब, देश में इस महामारी के बाद हम अछूतों का एक नया वर्ग उभरते हुए देख रहे हैं। ये हैं बीमार और मरीज, प्रवासी मजदूर, बेरोजगार, बेहद गरीब लोग। शहरों से उनका नाता टूट गया है और उनके गांव उन्हें वापस लेना नहीं चाहते क्योंकि वे बेरोजगार और कंगाल है। साथ ही सेहत का भी जोखिम है।

बीमारों का आज खुलेआम बहिष्कार हो रहा है। उनकी पत्नियों और बच्चों को कानून के मुताबिक घर में क्वारैंटाइन नहीं होने दे रहे हैं। उन्हें गांव से बाहर निकाल रहे हैं, ट्रेनों से परिजनों समेत फेंक दे रहे हैं। उनके मरने पर शमशान में उन्हें जलाने से इनकार कर रहे हैं। अस्पताल के गलियारों में मृत शरीर इकट्‌ठे हो रहे हैं। कोई उन्हें ले जाना नहीं चाहता। यहां तक कि उनके परिवार भी। इलाज करा रहे मरीजों के बगल में लाशें रखी हैं। यह भयंकर प्लेग की वापसी की तरह है।

लेकिन, आज निराश-हताश गरीब कौन हैं? नहीं, किसान नहीं जो हर साल गरीबी की वजह से आत्महत्या करते रहे हैं। अब ये हताश गरीब वे हैं जो कुछ समय पहले तक हमारी फैक्टरियों, ऑफिसों और हमारे घरों में काम कर रहे थे। इसमें छोटे व्यापारी, खाने के ठेले लगाने वाले, ऑटोरिक्शा ट्राइवर, छोटे रेस्तरां में काम करने वाले, मल्टीप्लेक्सों और मॉल के बाहर खड़े सिक्योरिटी गार्ड भी शामिल हैं।

वायरस और लॉकडाउन ने उन्हें बेरोजगार, बेघर और लगभग फटेहाल कर दिया। और अब उनके साथ करीब 14 करोड़ मध्यवर्गीय भी जुड़ गए हैं। एक रिसर्च के मुताबिक जून अंत तक इनकी बचत खत्म हो जाएगी। यानी अगल महीने के लिए इनके पासे पैसे नहीं होंगे।

हाल ही में हुआ एक सर्वे बताता है कि 84 फीसदी घरों में लॉकडाउन के बाद आय का गंभीर नुकसान हुआ है। वे अभी अपनी बचत पर जी रहे हैं। इस महीने के अंत तक बारिश के बढ़ने के साथ कई मध्यवर्गीय गरीबों की श्रेणी में फिसल जाएंगे।

वे इलाज पर खर्च करने, परिवार की आधारभूत जरूरतें पूरी करने में भी अक्षम हो जाएंगे। उन्हें किराए का घर छोड़ना पड़ेगा, अपना सामान बेचना पड़ेगा और ऐसी दर पर पैसा उधार लेना पड़ेगा, जिसे बाद में चुकाना उनके लिए असंभव हो जाएगा। वे पेंशनर भी परेशान हैं जो बैंक से मिलने वाले ब्याज पर निर्भर थे, क्योंकि बैंकों ने ब्याज दरें घटा दी हैं।

जो विदेश में नौकरी कर रहे बच्चों पर निर्भर थे, वे भी फंस गए हैं क्योंकि उनके बच्चों की नौकरी चली गई है या तन्ख्वाह कम हो गई है। इस बीच पेट्रोल-डीजल के दाम लगातार बढ़ रहे हैं, जबकि ग्लोबल ट्रेंड के आधार पर कीमतें घटनी चाहिए थीं। इससे हर चीज महंगी हो जाएगी।

कुल मिलाकर, महामारी की रफ्तार थमती नहीं दिख रही है और ज्यादा से ज्यादा लोग डूबते रहेंगे। सरकार इनके हाथों में नकद रखने से इनकार कर रही है, जैसा कुछ देश कर रहे हैं। ये नए अछूत हैं। इनके लिए किसी के पास समय नहीं है। और सरकार की इनके भविष्य में सबसे कम रुचि है। इसकी बजाय वह लाखों-करोड़ों की बड़ी-बड़ी योजनाएं बना रही है, जो इन लोगों तक कभी पहुंचेगी ही नहीं।

नतीजा? एक अक्षम सरकार और आलसी विपक्ष के बीच एक ऐसी अर्थव्यस्था बर्बाद हो रही है, जो भविष्य के लिए तैयार थी। अगर महामारी बनी रही और शासन की गुणवत्ता नहीं सुधरी, हम सभी अछूत बन जाएंगे।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)



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प्रीतीश नंदी, वरिष्ठ पत्रकार व फिल्म निर्माता


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