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बार, ऑर्केस्टा गर्ल और सेक्स वर्कर ड्रग डी-एडिक्शन सेंटर पहुंचीं; रोज योग कर रहीं, ताकि नशे से छुटकारा मिल जाए https://ift.tt/3elkTRi

इन लड़कियों के नाम छुपा रहा हूं, क्योंकि ये ड्रग एडिक्ट तो हैं ही, बार-ऑर्केस्ट्रा गर्ल्स और सेक्स वर्कर भी हैं। नशे में डूबे युवाओं ने पंजाब कोउड़ता पंजाब के नाम से शायद इसलिए ही बदनाम कर दिया, क्योंकि वह शालिनी हो या फिरप्रभजोत (दोनों बदले नाम), नशे की लत ने इन्हें सेक्स वर्कर बनने को मजबूर कर दिया या फिर डांस बार में नाचने के लिए।

कहती हैं कि फिमेल ड्रग डी-एडिक्शन सेंटर कपूरथला से जुड़ी हम दो लड़कियां नहीं हैं जो लॉकडाउन में नशा नहीं मिलने से अपने घर व सेंटर के पिंजरों में कैद हुई हैं, सौ से ज्यादा को तो वे जानती हैं, जिनकी शाम बिना नशे के ढलती नहीं थी। सामने देखो सिविल अस्पताल की वो लंबी लाइन, जिसमें सौ-दो सौ लोग नशे की दवा लेने खड़े हैं, उनके पास कई मां भी बैठी हैं जो अपनी बेटियों के नशे का इंतजाम करने यहां आई हैं।

अब सभी डी-एडिक्शन सेंटर से रजिस्ट्रेशन करवाकर सिविल अस्पताल से दवा ले रही हैं, जो नशे की जरूरत को पूरा करती हैं। दोनों ही कॉलेज में पढ़ती थीं, लेकिन दोस्तों के साथ सिगरेट के कश लगाने शुरू किए तो लत बन गई। घरवालों ने पढ़ाई छुड़ा दी, रिश्ते नहीं हुए तो पहले बार गर्ल बनीं, फिर जिस्मफरोशी के दलदल में फंस गईं।

सेंटर के नोडल ऑफिसर डाॅ. संजीब भोला ने बताया कि सेंटर से 159 महिलाएं रजिस्टर्ड हैं, इनमें से 95 फीसदी लड़कियां 18 से 25 साल की हैं। बार-आर्केस्ट्रा में नाचने-गाने वाली और सेक्स वर्कर का काम करने वाली इन लड़कियों को नशा आसानी से मिल जाता था, कस्टमर ही दे देता था, लेकिन लॉकडाउन में धंधा बंद हो गया तो बॉर्डर सील होने और लगातार कर्फ्यू के कारण नशा मिलना भी बंद हो गया। नशे के पंख कट गए, तब ये सेंटर तक आई हैं। उन्होंने बताया कि एक लड़की बीच में छोड़ गई थी, परंतु उसे भी लौटना पड़ा।

सेंटर के मैनेजर बलजिंदर सिंह जालंधर से अप-डाउन करते हैं। समय पर निकलना चाहते हैं, लेकिन सेंटर में भर्ती लड़कियों की चिंता और देखभाल में उन्हें अक्सर देरी हो जाती है। वे कहते हैं कि पंजाब की कई लड़कियों की जिंदगी बर्बाद हो गई, शादियां टूटने लगी तो डिप्रेशन में नशा करने लगीं। यहां हायर क्लास की लड़कियां भी आती हैं।

सेंटर का स्टाफ नशा पीड़ित लड़कियों को रोज सुबह योगा व मेडिटेशन कराता है। टीवी पर मोटिवेशन वाली डॉक्युमेंट्री दिखाता है। काउंसलिंग और इंडोर गेम्स से इनका मनोबल बढ़ाने का प्रयास करता है, ताकि वे नशे से आजाद हो सकें। उन्होंने बताया कि पिछले साल 55 महिलाओं का यहां भर्ती कर इलाज किया था, इस साल 25 को भर्ती किया, जिनमें से 7 का अभी यहीं इलाज चल रहा है।

ये लोगों की कतार नहीं, बर्बाद घरों की कहानियां हैं।

सिविल अस्पताल, लुधियाना के ड्रग डी-एडिक्शन सेंटर में सीता अपने मासूम बच्चे के साथ बैठी डाॅक्टर का इंतजार कर रही हैं। वह पहली बार इस सेंटर पर आई हैं। हमने पूछा कब से शुरू किया था नशा? तो बोली मैं नहीं। मेरे पति जसपाल सिंह दो साल से नशा कर रहे हैं, उन्हें लेकर आई हूं।

जसपाल मंडी में ठेकेदार है। कोरोना काल में काम बंद और नशा मिलना भी बंद। तीन बच्चों का पिता अब घर के पांच लोगों का पेट पालना तो चाहता है, लेकिन काम करने की ताकत नहीं बची। सीता उसे यहां ले आई। यहां से उसे बुप्रेनॉर्फिन व नेलोक्सोन की गोलियां मिलेंगी, जिन्हें दिन में तीन-तीन बार लेना होगा, तो जसपाल काम करने लायक हो जाएगा, उससे ही घर का राशन खरीद पाएगा।

शाही मोहल्ला का साजनसिंह नाहर दवा ले चुका। भाई कतार में था और मां दोनों को घर ले जाने के लिए सड़क पर बैठी थी। टिब्बा का सिराज अली 40 किमी दूर से आया था। नई नवेली भाभी भी साथ थी, पूछा ये भी नशा करती है? सिराज ने कहा इससे बात मत करो, यह भाई को लेकर आई है। सेंटर के बाहर दो लाइनें लगी हुई हैं, एक तरफ दवा के लिए पर्ची बनाने वालों की और दूसरी तरफ पर्ची से गोलियां लेने वालों की। मगर दोनों की लाइन बराबर है, दो सौ उधर भी हैं तो दो सौ से कम इधर भी नहीं हैं।

सेंटर प्रभारी डाॅ. विवेक कहते हैं कि लॉकडाउन में हर जिले की ओपीडी दो गुना हो गई है। ये लाइनें सुबह 5 बजे से लग जाती है। पंजाब में पिछले तीन महीनों में पचास हजार से ज्यादा नशेड़ी डी-एडिक्शन सेंटर पहुंचे हैं। लेकिन, इन दिनों किसी भी सेंटर में उन्हें भर्ती नहीं किया जा रहा है। हमने लुधियाना, जालंधर व कपूरथला के सेंटर बंद देखे, दूसरे जिलों में भी बंद ही पड़े हैं।



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पंजाब में पिछले तीन महीनों में 50 हजार से ज्यादा नशेड़ी डी-एडिक्शन सेंटर पहुंच चुके हैं। हालांकि, इन्हें सेंटर में भर्ती नहीं किया जा रहा है।


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