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‘नई’ भाजपा वैसी नहीं है, जैसा वह दावा करती थी; अब दिखने लगा है कि भाजपा का ‘कांग्रेसीकरण’ हो रहा https://ift.tt/2Xf3HGx

भारतीय राजनीति में आप कहां खड़े हैं, यह इसपर निर्भर है कि आप कहां बैठते हैं। इसका ताजा उदाहरण हैं राजस्थान के राज्यपाल कलराज मिश्र। मिश्र 1998 में उस भाजपा प्रतिनिधि मंडल का हिस्सा थे जो उप्र के तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी द्वारा कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त करने के खिलाफ धरने पर बैठा था।

अब कांग्रेस के विधायक जो राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की तुरंत सत्र बुलाने की मांग को मिश्र द्वारा खारिज करने के विरोध में धरने पर बैठे। राज्यपाल ने मांग मान ली, लेकिन सत्र बुलाने के लिए 21 दिन के नोटिस पीरियड पर जोर दिया है, जो कि विधायकों की खरीद-फरोख्त व एक और कांग्रेस सरकार को गिराने के लिए पर्याप्त समय होगा। स्पष्ट है कि मिश्र की निष्ठा संविधान में नहीं, केंद्र में है।

मिश्र विवादों में आने वाले पहले राज्यपाल नहीं हैं। 2017 में गोवा में मृदुला सिन्हा और मणिपुर में नजमा हेपतुल्लाह ने भाजपा सरकारों को जल्दबाजी में शपथ दिलाई। कर्नाटक में 2018 में वजूभाई वाला, जो कि गुजरात बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष थे, ने बीएस येद्दुरप्पा को बिना बहुमत सरकार बनाने का आमंत्रण दिया था।

सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद सरकार 48 घंटे में ही गिर गई। महाराष्ट्र में 2019 में बीएस कोशियारी ने अलसुबह देवेंद्र फडनवीस को शपथ दिलवा दी थी। इन सभी राज्यपालों में एक बात समान है। ये सभी बीजेपी के ‘मार्गदर्शक मंडल’ राजनेता हैं, जिनके लिए राज भवन आलीशान रिटायरमेंट होम की तरह है।

ये संवैधानिक प्राधिकारी अपने पक्षपाती कामों के बचाव में कहते हैं कि वे तो बस कांग्रेस पार्टी द्वारा स्थापित पुरानी परंपरा निभा रहे हैं, जिसमें हमेशा राज्यपाल कार्यालय का दुरुपयोग होता था। एक तरह से यह भाजपा के ‘कांग्रेसीकरण’ का ही सबूत है।

इन्होंने बाकियों से अलग होने का जो दावा जोर-शोर से किया था, उसका मतलब सिर्फ कांग्रेस का विकल्प बनना नहीं बल्कि एक वैकल्पिक राजनीतिक संस्कृति देना भी था। वाजपेयी-आडवाणी के दौर में ‘मूल्य-आधारित’ राजनीति का दावा करने वाली भाजपा में अब ऊंचे मोल की राजनीति हो रही है, जहां राजनीतिक साजिशों के साथ कीमत जुड़ी है।

उदाहरण के लिए प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने गहलोत के भाई को खाद घोटाले के 2007 के एक मामले में समन भेज दिया। ईडी पर भाजपा के सहयोगी और राजनीतिक बदला लेने का हथियार होने के आरोप लगते रहे हैं।

यहां भी बचाव में यही कहा जा रहा है कि कांग्रेस का भी सरकारी एजेंसियों के इस्तेमाल का ट्रैक रिकॉर्ड रहा है। लेकिन अगर कांग्रेस के शासन में सीबीआई पिंजरे का तोता थी तो क्या ईडी भाजपा शासन में खूंखार कुत्ता है? फिर अलग होने का दावा करने वाली पार्टी का क्या हुआ?

राजस्थान में पार्टी बदलने के लिए भारी मात्रा में पैसे दिए जाने के आरोपों का भी विश्लेषण करें। भले ही यह अटकलबाजी हो, लेकिन दल-बदल के पीछे मंत्री बनने के लालच से इनकार नहीं कर सकते। जिन्होंने पार्टी बदली उन्हें नवाजा गया, फिर वह गोवा रहा हो, मणिपुर, कर्नाटक या एमपी।

पैसे की ताकत के नशे को कांग्रेस के पतन का कारण माना गया और इसके विपरीत भाजपा नेताओं की सादगीपसंद छवि मानी गई। अब दल बदलने के लिए भड़काने वाली भाजपा के अलग होने के दावे का क्या हुआ?

सच्चाई यह है कि भाजपा पूर्ण प्रभुत्व की लालसा में आदर्शवाद के किसी भी अवशेष से समझौता कर सकती है। वह संसद में हो या विधानसभा या फिर नगर निगमों में, भाजपा की जितनी ‘जीत’ रही हैं, वे दरअसल पूर्व कांग्रेसी रहे हैं, जो भगवा लहर में बह गए।

फिर वे मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बिरेन सिंह हो, गोवा के उपमुख्यमंत्री चंद्रकांत कावलेखर, मप्र में शिवराज सरकार के आधे मंत्री हो, असम के हेमंत बिस्व सरमा हों या फिर अरुणाचल के मुख्यमंत्री प्रेमा खांडू। ये सभी भाजपा में शामिल होने से पहले लंबे समय कांग्रेस में रहे। फेहरिस्त लंबी है।

यह ‘नई’ भाजपा की हिंसक, अनैतिक प्रवृत्ति का खुलासा भी करता है, जो किसी भी तरह अपने विरोधी को तबाह करना चाहती है। इस प्रक्रिया में कभी बहुत अनुशासित रहा भाजपा का ढांचा और वैचारिक सामंजस्य खतरे में है। जब आप अवसरवादिता को बढ़ावा दें और नैतिक व्यवहार को कमजोर करें तो आप भविष्य के संभावित राजनीतिक खतरों को जन्म देते हैं।

उधर राजनीति की कठोर वास्तविकताओं से आरएसएस का भी अपनी राजनीतिक शाखा पर से नियंत्रण लगातार कम हो रहा है। जहां पहले नैतिक अधिकार आरएसएस सरसंघचालक का माना जाता था, अब मोदी-शाह युग में वे स्पष्टरूप से दूसरे पायदान पर आ गए हैं।

वहीं अब संस्थागत नियंत्रण लगभग पूरा हो चुका है। एक चुनाव आयुक्त, जो असहमति जताते हैं तो उन्हें गैरजरूरी पद पर मनिला भेज देते हैं। एक सुप्रीम कोर्ट जज को रिटायरमेंट के कुछ ही महीनों में राज्यसभा के लिए नामित कर देते हैं, जबकि प्रधानमंत्री की तारीफ करने वाले एक मौजूदा जज राजनीति के विवादास्पद मामलों की सुनवाई करते हैं।

संसद एक नोटिस बोर्ड बनकर रह गई है। और मीडिया का एक बड़ा हिस्सा चीयरलीडर की भूमिका में है। इस बीच भाजपा विस्तार कर रही है। कल मध्यप्रदेश, आज राजस्थान और पता नहीं कल कौन-सा विपक्ष शासित राज्य। क्या विरोधी आवाज के लिए कोई जगह बची है? (ये लेखक के अपने विचार हैं)



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राजदीप सरदेसाई, वरिष्ठ पत्रकार


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