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चीन ने जता दिया है कि उसे भारत के साथ आर्थिक संबंधों का मोल नहीं है, ऐसे में नई दिल्ली की प्रतिक्रिया भावनाओं के आधार पर नहीं होना चाहिए https://ift.tt/2ZwOxwA

नई दिल्ली बीजिंग को चुनौती देने के लिए कई विकल्पों पर काम कर रही है। इसमें व्यापार और अर्थ पर खास ध्यान दिया जा रहा है। यह विडंबना है कि अब तक आर्थिक गंठबंधनों को 1962 में भारत-चीन संबंधों को मिली चोट पर मरहम बताया जाता रहा है। और आज यही क्षेत्र कई भारतीयों के लिए चीन के प्रति गुस्सा दिखाने का केंद्र बिंदु बन गया है।

एलएसी पर विवाद से पहले ही प्रधानमंत्री मोदी आत्मनिर्भरता को कोविड-19 का सबसे बड़ा सबक बता चुके थे, हालांकि तब इशारा चीन की ओर नहीं था। हालांकि, भारत की तरफ से हाल के महीनों में चीनी आयात पर निर्भरता कम करने के प्रयास किए जा रहे हैं। और सीमा संकट के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि भारत अब हर संभव विकल्पों पर विचार कर रहा है।

पिछले कुछ दिनों में भारतीय रेलवे ने चीनी कंपनी के साथ 470 करोड़ रुपए का एक करार तोड़ दिया और बीएसएनएल व एमटीएलएल से सरकार ने 4जी अपग्रेडेशन के लिए चीनी उपकरण इस्तेमाल न करने को कहा है। भारत ने राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा बताते हुए टिकटॉक और यूसी ब्राउजर सहित 59 चीनी एप्स बैन कर दिए हैं।

खबर है कि नई दिल्ली भारत में न बनने वाले कंपोनेंट्स के वैकल्पिक सप्लायर्स की सूची बना रही है, जो चीनी आयातकों का विकल्प बन सकें। कंफेडेरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स ने 2018-19 में चीन से हुए 70 बिलियन डॉलर के आयात को घटाकर दिसंबर 2021 तक 13 बिलियन डॉलर करने का आह्वान किया है।

भारत के कुल आयात में चीन की हिस्सेदारी 11.8% और भारत के निर्यात में चीन की हिस्सेदारी महज 3% रही है, जिससे भारत को हो रहा व्यापार घाटा एक समस्या रहा है। भारतीय स्टार्ट-अप सेक्टर में भी चीनी निवेश लगतार बढ़ा है।

व्यापार संबंधों में बिना सोचे-समझे बदलाव भारतीय व्यापारों और सबसे ज्यादा भारतीय गरीबों को प्रभावित करेंगे, खासतौर पर तब जब अर्थव्यवस्था कोरोना के न्यू नॉर्मल में संभलने की कोशिश कर रही है। नई दिल्ली का खुद की निर्माण क्षमता विकसित करने के प्रयास सही है, लेकिन ऐसा कम समय में नहीं होने वाला।

चीनी आयात पर अचनाक बैन न सिर्फ कोविड-19 के बाद के शुरुआती सुधारों को प्रभावित करेगा, बल्कि तैयार माल का मैन्यूफैक्चरर बनकर उभरने की भारतीय महत्वाकाकांक्षा को भी चुनौती मिलेगी। बेशक नई दिल्ली को संघर्ष बढ़ने की स्थिति में चीन से व्यापारिक संबंधों को खत्म करने से रोका नहीं जा सकता, लेकिन यह आखिरी विकल्प ही होगा।

इसलिए कम या मध्यम समय में चीन से आर्थिक रूप से पूरी तरह अलग होना न ही वांछनीय है और न ही जरूरी। इसकी जगह नई दिल्ली को व्यापार और आर्थिक संघर्ष को बढ़ाने के खतरे का इस्तेमाल करना चाहिए। बिना स्थायी फायदे वाले संबंध में हर संभव उपाय का सोच-समझकर पूरा दोहन करना चाहिए।

इसमें कोई शक नहीं कि भारत को लंबे समय में चीन पर अपनी आर्थिक निर्भरता कम करनी होगी, लेकिन कम समय में भारत को क्षेत्रवार ढंग से चीन को अलग करना चाहिए, यह दिखाने के लिए कि भारत इस उद्देश्य में गंभीर है। चीन ने हालिया हरकतों ने स्पष्ट कर दिया है कि उसे भारत के साथ आर्थिक संबंधों का मोल नहीं है।

नई दिल्ली की प्रतिक्रिया त्वरीत भावनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि लंबे समय में खुद को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने की जरूरत के आधार पर होना चाहिए, ताकि वह कोविड-19 के बाद की वैश्विक आर्थिक व्यवस्था की केंद्र बिंदु बन सके।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)



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हर्ष वी पंत, प्रो. इंटरनेशनल रिलेशन्स, किंग्स कॉलेज लंदन


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