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आज दोस्तों के साथ शेयर करें और पढ़े जिंदगी में दोस्त और दोस्ती की अहमियत समझातीं 4 कहानियां https://ift.tt/3hUYICT

जिंदगी में दोस्त और दोस्ती एक तोहफे की तरह होते हैं, जिन्हें हम खुद चुनते हैं। एक सच्चा दोस्त वही होता है, जो मुश्किल से मुश्किल समय में भी अपने दोस्त को अकेले नहीं छोड़ता। आज फ्रेंडशिप डे के मौके पर पढ़िए बचपन की ऐसी चार चुनिंदा कहानियां जो जिंदगी में दोस्त और दोस्ती की अहमियत समझाती हैं।

पहली कहानी: दोस्ती की इबारतें

एक बार दो दोस्त रेगिस्तान पार कर रहे थे। रास्ते में उनका किसी बात का झगड़ा हो गया। पहले दोस्त ने दूसरे को गुस्से में आकर थप्पड़ मार दिया। दूसरे दोस्त को इस बात से दिल पर बहुत ठेस पहुंची और उसने रेत पर एक लकड़ी से लिखा, ‘आज मेरे सबसे अच्छे दोस्त ने छोटा सा झगड़ा होने पर मुझे थप्पड़ मार दिया।’ दोनों ने मंजिल पर पहुंचने के बाद झगड़ा सुलझाने का फैसला किया।

दोनों आपस में बिना बात किए साथ-साथ चलते रहे। आगे उन्हें एक बड़ी झील मिली, उन्होंने झील में नहाकर तरोताजा होने का फैसला किया। झील के दूसरे किनारे पर बहुत ही खतरनाक दलदल था। वह दोस्त जिसने चांटा मारा था, वह उस दलदल में जा फंसा और डूबने लगा। उसके दोस्त ने जब यह देखा तो वह तुरंत ही दूसरी तरफ तैरकर गया और बड़ी मशक्कत के बाद अपने दोस्त को बाहर निकाल लिया।

जिस दोस्त को दलदल से बचाया था, उसने झील के किनारे एक बड़े पत्थर पर लिखा, ‘आज मेरे दोस्त ने मेरी जान बचाई।’ इस पर दूसरे दोस्त ने पूछा- जब मैंने तुम्हें थप्पड़ मारा तो तुमने उसे रेत पर लिखा, लेकिन जब मैंने तुम्हारी जान बचाई तो तुमने पत्थर पर लिखा ऐसा क्यों?

दूसरे दोस्त ने जवाब दिया, जब कोई हमें दुख पहुंचाता है, तो हमें इसे रेत पर लिखना चाहिए ताकि वक्त और माफी की हवाएं उसे मिटा दें। लेकिन जब कोई हमारे साथ अच्छा बर्ताव करे तो हमें उसे पत्थर पर लिखना चाहिए, जिसे हवा या इंसान तो क्या वक्त भी न मिटा ना सके।

सीख- दोस्ती में कभी भी बुरी घटनाओं को दिल से लगाकर नहीं रखना चाहिए, दोस्त की भूल को माफ कर देना ही सच्ची दोस्ती है।

दूसरी कहानी: दोस्ती और पैसा

एक गांव में रमन और राघव नाम के दो दोस्त रहा करते थे। रमन धनी परिवार का था और राघव गरीब। हैसियत में अंतर होने के बावजूद दोनों पक्के दोस्त थे। समय बीता और दोनों बड़े हो गए। रमन ने अपना पारिवारिक व्यवसाय संभाल लिया और राघव ने एक छोटी सी नौकरी तलाश ली। जिम्मेदारियों का बोझ सिर पर आने के बाद दोनों के लिए एक-दूसरे के साथ पहले जैसा समय गुजार पाना संभव नहीं था, लेकिन जब मौका मिलता, तो जरूर मुलाकात करते।

एक दिन रमन को पता चला कि राघव बीमार है और वह उसे देखने उसके घर चला आया। हाल-चाल पूछने के बाद रमन वहां अधिक देर रुका नहीं और अपनी जेब से कुछ पैसे निकाले और उसे राघव के हाथ में थमाकर वापस चला गया। राघव को रमन के इस व्यवहार पर बहुत दुःख हुआ, लेकिन वह कुछ बोला नहीं। ठीक होने के बाद उसने कड़ी मेहनत की और पैसों का इंतजाम कर रमन के पैसे लौटा दिए।

कुछ ही दिन बीते ही थे कि रमन बीमार पड़ गया है। जब राघव को इस बारे में पता चला, तो वह अपना काम छोड़ भागा-भागा रमन के पास गया और तब तक उसके साथ रहा, जब तक वह ठीक नहीं हो गया। राघव का यह व्यवहार रमन को उसकी गलती का अहसास करा गया और वह ग्लानि से भर उठा।

एक दिन वह राघव के घर गया और अपने बर्ताव के लिए माफी मांगते हुए बोला, “दोस्त! जब तुम बीमार पड़े थे, तो मैं तुम्हें पैसे देकर चला आया था। लेकिन जब मैं बीमार पड़ा, तो तुम मेरे साथ रहे। मुझे अपने किये पर बहुत शर्मिंदगी है। मुझे माफ कर दो।”

राघव ने रमन को गले से लगा लिया और बोला, “कोई बात नहीं दोस्त। मैं खुश हूं कि तुम्हें ये अहसास हो गया कि दोस्ती में पैसा मायने नहीं रखता, बल्कि एक-दूसरे के प्रति प्रेम और एक-दूसरे की परवाह मायने रखती है।”

सीख – पैसों से तोलकर दोस्ती को शर्मिंदा न करें। दोस्ती का आधार प्रेम, विश्वास और एक-दूसरे की परवाह है।

तीसरी कहानी: दोस्ती और भरोसा

रात के समय परदेस की यात्रा पर निकले दो दोस्त सोहन और मोहन एक जंगल से गुजर रहे थे। सोहन को भय था कि कहीं किसी जंगली जानवर से उनका सामना न हो जाए। वह मोहन से बोला, “दोस्त! इस जंगल में अवश्य जंगली जानवर होंगे। यदि किसी जानवर ने हम पर हमला कर दिया, तो हम क्या करेंगे?” सोहन बोला, “मित्र डरो नहीं, मैं तुम्हारे साथ हूं। कोई भी ख़तरा आ जाये, मैं तुम्हारा साथ नहीं छोडूंगा। हम दोनों साथ मिलकर हर मुश्किल का सामना कर लेंगे।”

इसी तरह बातें करते हुए वे आगे बढ़ते जा रहे थे कि अचानक एक भालू उनके सामने आ गया। दोनों दोस्त डर गए। भालू उनकी ओर बढ़ने लगा। सोहन डर के मारे तुरंत एक पेड़ पर चढ़ गया। उसने सोचा कि मोहन भी पेड़ पर चढ़ जायेगा। लेकिन मोहन को पेड़ पर चढ़ना नहीं आता था। वह असहाय सा नीचे ही खड़ा रहा।

भालू उसके नजदीक आने लगा और मोहन डर के मारे पसीने-पसीने होने लगा। लेकिन डरते हुए भी एक उपाय उसके दिमाग में आ गया। वह जमीन पर गिर पड़ा और अपनी सांस रोककर एक मृत व्यक्ति की तरह लेटा रहा। भालू नजदीक आया और मोहन के चारों ओर घूमकर उसे सूंघने लगा। पेड़ पर चढ़ा सोहन यह सब देख रहा था। उसने देखा कि भालू मोहन के कान में कुछ फुसफुसा रहा है। कान में फुसफुसाने के बाद भालू चला गया।

भालू के जाते ही सोहन पेड़ से उतर गया और मोहन भी तब तक उठ खड़ा हुआ। सोहन ने मोहन से पूछा, “दोस्त! जब तुम जमीन पर पड़े थे, तो मैंने देखा कि भालू तुम्हारे कान में कुछ फुसफुसा रहा है। क्या वो कुछ कह रहा था?” “हाँ, भालू ने मुझसे कहा कि कभी भी ऐसे दोस्त पर विश्वास मत करना, तो तुम्हें विपत्ति में अकेला छोड़कर भाग जाए।”

सीख – जो दोस्त संकट में छोड़कर भाग जाए, वह भरोसे के काबिल नहीं।

चौथी कहानी: दो सैनिक दोस्त

दो बचपन के दोस्तों का सपना बड़े होकर सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करना था। दोनों ने अपना यह सपना पूरा किया और सेना में भर्ती हो गए। बहुत जल्द उन्हें देश सेवा का अवसर भी प्राप्त हो गया। जंग छिड़ी और उन्हें जंग में भेज दिया गया, वहां जाकर दोनों ने बहादुरी से दुश्मनों का सामना किया।

जंग के दौरान एक दोस्त बुरी तरह घायल हो गया। जब दूसरे दोस्त को यह बात पता चली, तो वह अपने घायल दोस्त को बचाने भागा। तब उसके कैप्टन ने उसे रोकते हुए कहा, “अब वहां जाने का कोई मतलब नहीं। तुम जब तक वहाँ पहुंचोगे, तुम्हारा दोस्त मर चुका होगा।”

लेकिन वह नहीं माना और अपने घायल दोस्त को लेने चला गया। जब वह वापस आया, तो उसके कंधे पर उसका दोस्त था, लेकिन वह मर चुका था। यह देख कैप्टन बोला, “मैंने तुमसे कहा था कि वहां जाने का कोई मतलब नहीं। तुम अपने दोस्त को सही-सलामत नहीं ला पाए। तुम्हारा जाना बेकार रहा।”

सैनिक ने उत्तर दिया, “नहीं सर, मेरा वहां उसे लेने जाना बेकार नहीं रहा। जब मैं उसके पास पहुँचा, तो मेरी आंखों में देख मुस्कुराते हुए उसने कहा था – दोस्त मुझे यकीन था, तुम जरूर आओगे। ये उसके अंतिम शब्द थे। मैं उसे बचा तो नहीं पाया, लेकिन उसका मुझ पर और मेरी दोस्ती पर जो यकीन था, उसे बचा लिया।”

सीख – सच्चे दोस्त अंतिम समय तक अपने दोस्त का साथ नहीं छोड़ते।



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