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नया विचार: ‘फील गुड’ पाने के लिए अपने भविष्य के साथ जुआ न खेलें, अच्छी आदतों के सहारे कल नहीं, आज से ही ऊंचे मुकाम पर पहुंचने की काेशिश करें https://ift.tt/3l7IFEe

आजकल बायोपिक का चलन है। काल्पनिक कहानियों से ऊब कर, पब्लिक ‘स्लाइस ऑफ लाइफ’ देखना चाहती है। जाहिर है उस आदमी या औरत में कुछ खास होना चाहिए। और फिर फिल्म मेकर उस स्टोरी में थोड़ा नमक-मिर्च डालकर उसे ऑडियंस के सामने पेश कर देता है। दो-ढाई घंटे के लिए हम उसमें मशगूल हो जाते हैं, ख्वाब भी देखने लगते हैं। फिर घर जाते हैं और असर उतर जाता है।

वापस उस दायरे में कैद हो जाते हैं, जो बचपन से देखा, सुना, जिया था। क्योंकि उसमें एक सेफ्टी और कम्फर्ट है। चाहे पिक्चर में उस आदमी या औरत ने कितना भी स्ट्रगल किया हो, अपनी जिंदगी में हम स्ट्रगल नहीं चाहते। और खासकर अपने बच्चों के लिए तो कतई नहीं।
रोज सुबह जब नींद खुलती है, मन करता है पांच मिनट और सो लें। यह शरीर की वीकनेस है कि वो आराम चाहता है। जिसका मन शक्तिशाली है वो शरीर को कमांड देता है: उठ जाओ। एक्टिविटी शुरू करो। आप लगातार ऐसा करते रहें तो समय पर उठने की आदत सेट हो ही जाती है।
जगजीत सिंह एक जमाने में डीएवी जालंधर में पढ़ते थे। कहते हैं कि हर साल उनके हॉस्टल में काफी झगड़े होते थे कि हमें इस बंदे के आस-पास कमरा अलॉट मत कीजिए। क्योंकि सुबह पांच बजे से उनका रियाज़ शुरू हो जाता था और इस ह्यूमन अलार्म क्लॉक से दूसरों की नींद भंग होती थी।

जरा सोचिए, कितना सुनहरा मौका था उन आराम-पसंद छात्रों के लिए। अगर वे भी साथ उठकर पढ़ाई पर ही थोड़ा ध्यान देते तो कहां से कहां पहुंच जाते। लेकिन आदत से मजबूर। तो फिर इन आदतों को कैसे बदलें? हर साल एक जनवरी को बहुत सारे रेजॉल्यूशंस हम बनाते हैं। पांच जनवरी तक सब भूल जाते हैं।
मेरी सलाह है कि एक कदम बढ़ाइए। कोई एक मुद्दा लेकर उसी में छोटा-सा सुधार कीजिए। जैसे कई लोग कहते हैं कि मुझे किताब पढ़ने का टाइम नहीं मिलता। जनाब, रोज रात को सोने से पहले बस ये काम कीजिए। फोन को किसी और कमरे में सुला दें। अपनी बेडसाइड टेबल पर एक किताब रखें, रोज पांच-सात पेज पढ़ लें।

एक महीने में किताब कंप्लीट हो जाएगी। इस छोटी-सी आदत से क्या फायदा होगा? जब हम नेटफ्लिक्स का कोई सीरियल देखते हैं तो हम पैसिव मोड में होते हैं। हमें कोई मेहनत नहीं करनी पड़ती। मगर किताबों की दुनिया में घुलने के लिए दिमाग लगाना पड़ता है। अपनी इमेजिनेशन का इस्तेमाल करना पड़ता है। और उसी चीज की आज हमें सख्त जरूरत है। अपने मन के परदे पर सपने देखने के लिए।
दूसरी बात यह कि वॉट्सएप में आपको हर तरह की न्यूज और वीडियो मिलते हैं और अच्छा भी लगता है। मगर दिमाग के लिए वो जंक फूड है। कभी-कभी आप बर्गर और चिप्स खाएंगे तो कोई बुरा नहीं। मगर आप दाल-चावल, सब्जी-रोटी छोड़कर सिर्फ बेकार का खाना खाएंगे तो शरीर का क्या हाल होगा?

नतीजा साफ दिख रहा है। दिमाग को भी न्यूट्रीशन की जरूरत है। ऐसा नहीं कि इंटरनेट खराब चीज है पर उसका सोच-समझकर इस्तेमाल कीजिए। यू-ट्यूब पर कॉमेडी देखिए पर साथ-साथ एक 18 मिनट की टेड टॉक भी। पढ़ाई या बिजनेस के फील्ड में लेटेस्ट डेवलपमेंट्स हैं, उनपर गूगल सर्च कीजिए। ये सोने की खान है, सिर्फ मिट्‌टी में लोट-पोट न करिए।
क्या आपको पता है, स्टीव जॉब्स ने दुनिया को आईपैड दिया मगर अपने बच्चों के हाथ में नहीं? इसी तरह बिल गेट्स के घर में खाने की टेबल पर मोबाइल फोन बैन है और स्क्रीनटाइम पर भी लिमिट लगा दी गई। क्योंकि उनको बखूबी पता है कि सोशल मीडिया एक मायाजाल है। उसमें जो फंस गया, निकल नहीं पाता।
हम रोज लॉगइन करके यह देखते हैं कि मेरे पोस्ट को कितने लाइक्स मिले। अगर ज्यादा लाइक्स हैं तो हमारा ब्रेन डोपामाइन रिलीज करता है। इसे ‘फील गुड’ केमिकल कहते हैं। सिगरेट पीने से या जुआ खेलने से भी यही असर होता है। तो अपने फ्यूचर के साथ जुआ न खेलें। अच्छी आदतों के सहारे ऊंचे मुकाम पर पहुंचें। कल नहीं, आज से। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)



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New idea: don't gamble with your future to get 'feel good'


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