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6 दिसंबर को अयोध्या में मौजूद पत्रकारों की आंखों-देखी; विहिप नेता कह रहे थे कि सिर्फ साफ-सफाई, पूजा-पाठ होगा, कारसेवक बोल रहे थे, बाबरी गिराएंगे https://ift.tt/34a0QkL

अयोध्या में बाबरी मस्जिद के विवादित ढांचे को गिराए जाने के करीब 28 साल हो गए हैं। इस मामले के क्रिमिनल केस की सुनवाई लखनऊ में सीबीआई की विशेष कोर्ट कर रही थी, जो आज अपना फैसला सुनाएगी। ढांचा गिराने के मामले में 32 आरोपी हैं। इनमें पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह, भाजपा के दिग्गज नेता मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, विनय कटियार आदि।

इस पूरे मामले की जांच सीबीआई कर रही थी। पूरे मामले में सबसे ज्यादा गवाही पत्रकारों की हुई। पत्रकारों ने ही सबसे ज्यादा एफआईआर भी दर्ज करवाई थी। दरअसल, विवादित ढांचा गिराए जाने के दिन बड़ी संख्या में पत्रकारों के साथ अयोध्या में मारपीट हुई थी। भीड़ ने उनके कैमरे तोड़ दिए थे या छीन लिए थे।

इसलिए आज फैसले के दिन 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में कवरेज के लिए मौजूद 4 पत्रकारों की आंखों-देखी जानते हैं। उन्होंने उस दिन क्या देखा था और बाद में सीबीआई ने उनसे गवाही में क्या पूछा।

एक दिन पहले ही लिख दिया था- विवादित ढांचे का राम ही मालिक

राजेंद्र सोनी, 30 साल से अयोध्या में पत्रकार हैं। फिलहाल आकाशवाणी और दूरदर्शन में काम करते हैं। सोनी बताते हैं कि सीबीआई ने मुझे भी समन भेजा था, लेकिन मैं जवाब देने को तैयार नहीं हुआ। मैं 1992 में आज अखबार का संवाददाता था। मैंने 6 दिसंबर से एक दिन पहले लिख दिया था कि 'विवादित ढांचे का राम ही मालिक...'। सुबह को जब अखबार आया तो खुफिया विभाग के लोगों ने मुझसे पूछा कि आपने ने ऐसे कैसे लिख दिया। फिर मैंने उन्हें सबूत बताए।

दरअसल, 6 दिसंबर की सुबह कारसेवा एकदम सांकेतिक थी। विहिप के लोग सरयू-जल और बालू से राम जन्मभूमि परिसर में पूजा-पाठ करना चाह रहे थे। इसी के लिए देशभर से लोगों को बुलाया भी था। विहिप ने विवादित ढांचे के किनारे संघ के लोगों को खड़ा कर रखा था, ताकि वहां किसी तरह की गड़बड़ी न हो।

सुबह जब वहां मौजूद भीड़ कुदाल-फावड़े आदि लेकर ढांचे की तरफ बढ़नी शुरू हुई तो संघ के लोगों ने उन्हें रोका और फिर छीना-झपटी भी हुई। लेकिन, भीड़ नहीं मानी। विहिप नेता अशोक सिंघल माइक से बोल रहे थे कि हमारी सभा में अराजक तत्व आ गए हैं।

विहिप ने भूमि पूजन कार्यक्रम की कवरेज के लिए मीडिया के लोगों को बगल में मानस भवन की छत पर रोका हुआ था। लेकिन, ढांचा गिरने के बाद पत्रकारों की बहुत पिटाई हुई। भीड़ ने पत्रकारों के कैमरे छीन लिए। बाद में पत्रकारों ने एफआईआर दर्ज करवाई, सरकार ने उन्हें इसका भुगतान भी किया। हालांकि, मैंने ऐसा नहीं किया।

कल्याण सिंह की खबर को लेकर सीबीआई ने समन भेजा था, मैंने कहा- जो लिखा था, वही सही है

वीएन दास करीब 35 साल से अयोध्या में नवभारत टाइम्स के संवाददाता हैं। विवादित ढांचा गिराए जाने के दिन भी वे अयोध्या में मौजूद थे। सीबीआई ने इन्हें भी गवाही के लिए समन भेजा था। दास बताते हैं कि मुझे सीबीआई ने कल्याण सिंह की सभाओं की कवरेज से जुड़ी खबर को लेकर बुलाया था।

दरअसल, कल्याण सिंह ने ढांचा गिराए जाने के बाद गोंडा, बलरामपुर, अयोध्या समेत आसपास के कई जिलों में सभाएं की थीं। इनमें उन्होंने ढांचा गिराए जाने को सही ठहराया था। इसी खबर को लेकर सीबीआई मुझसे पूछताछ करना चाह रही थी। मैं हाजिर भी हुआ था, मैंने सीबीआई के सामने साफ कह दिया कि जो मेरी खबर में लिखा है, वह एकदम सही है।

6 दिसंबर की बात करूं तो उस दिन परिसर में एक मंच पर लालकृष्ण आडवाणी, उमा भारती, अशोक सिंहल जैसे तमाम लोग मौजूद थे। दूसरी ओर मानस भवन हम पत्रकार लोग मौजूद थे। विहिप इसे दूसरे चरण की कारसेवा बता रही थी। उसका कहना था कि इसमें सिर्फ मंदिर परिसर की साफ-सफाई ओर पूजा-पाठ करेंगे। लेकिन, कारसेवक इससे सहमत नहीं थे।

उनका कहना था कि वे यहां इतनी दूर-दूर से साफ-सफाई करने नहीं, ढांचे को गिराने आए हैं। उत्तेजित भीड़ ने दोपहर तक ढांचा भी गिराना शुरू कर दिया। इस बीच मुझे अपने सांध्य अखबार के लिए खबर देनी थी और ऑफिस निकल पड़ा। लेकिन, रास्ते में देखा की भीड़ में महंत नृत्यगोपाल दास फंसे हुए हैं, उन्हें मैंने कार में बैठाकर मणिराम छावनी छोड़ा।

शाम को फिर लौटा तो देखा ढांचा ध्वस्त था। विहिप के लोग तो वहां से गायब हो गए थे, लेकिन दुर्गावाहिनी की महिलाएं गिराए गए ढांचे के किनारे मंदिर बना रही हैं और जय श्री राम के नारे लगा रही थीं। फिर मैंने अखबार में हेडिंग दिया- विवादित परिसर में रात 9 बजे..।

उस दिन बीबीसी के पत्रकार मार्क टुली को रामनामी पहनाकर भीड़ से निकालना पड़ा था, तब जाकर उनकी जान बची थी

वरिष्ठ पत्रकार डाॅक्टर उपेंद्र, उस समय दैनिक जागरण की अयोध्या डेस्क देख रहे थे। इससे पहले वह अयोध्या के ब्यूरो चीफ भी रह चुके थे। डॉ. उपेंद्र बताते हैं कि उस दिन मैं लखनऊ में था। मेरे संपादक विनोद शुक्ला अयोध्या में थे। शाम तक उनसे बात होती रही, वे बता रहे थे कि सब सामान्य है। लेकिन, 5 दिसंबर की रात करीब 10 बजे मेरे पास कुछ लोगों के फोन आए। सबने मुझसे- पूछा कि आप लखनऊ में क्या कर रहे हैं। यहां आ जाओ, नहीं तो ये दिन हमेशा मिस करोगे।

मैं ऑफिस से निकला और नेशनल हेराल्ड अखबार की गाड़ी पकड़कर किसी तरह फैजाबाद पहुंचा। पहले होटल शाने अवध गया। यहां से एकदम भोर में सीधे जन्मभूमि परिसर पहुंच गया। यहां विनोद शुक्ला, बीबीसी के पत्रकार मार्क टली आदि मौजूद थे। विहिप के कार्यकर्ता पत्रकारों को चाय पिला रहे थे।

सुबह 9 बजे का वक्त रहा होगा। पूजा-अर्चना चल रही थी। अचानक कारसेवकों का एक समूह आया और अशोक सिंहल को धक्का मार दिया। फिर तो उपद्रव शुरू हो गया। इस बीच कुछ लोगों ने मार्क टुली को देख लिया। दरअसल, तब कारसेवकों में रोष था कि बीबीसी उन्हें उग्रवादी कहता है।

फिर क्या कारसेवक टुली को पीटने लगे, किसी तरह हम लोगों ने उन्हें एक मंदिर में छिपाया। फिर उनके गले में रामनामी लपेटा। और बाद में जय श्रीराम बोलते हुए उन्हें सुरक्षित जगह पहुंचाया।

सहारा अखबार के फोटोग्राफर राजेंद्र कुमार काे भीड़ ने इतना मारा कि उनका जबड़ा टूट गया। वो ढाई महीने तक अस्पताल में भर्ती रहे। पूरे 32 साल के करिअर में मैंने तमाम बड़ी घटनाओं की कवरेज की, लेकिन पत्रकारों की इतनी बुरी पिटाई कभी नहीं देखी। बीबीसी, सीएनएन, एनवाईटी से लेकर दुनिया भर के पत्रकार पीटे गए।

बाद में कुछ साल पहले सीबीआई ने मुझे समन भेजा। मैं हाजिर हुआ था, तो पता चला कि पूछताछ में मेरी खबरों और मेरे एक बयान को आधार बनाया गया था। सीबीआई ने मुझसे कई सवाल किए थे। इसमें पूछा कि उस दिन वहां उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा, पवन पांडेय, संतोष दुबे क्या कर रहे थे? मैंने उन्हें बताया कि हम 800 मीटर की दूरी पर थे, वहां से कुछ साफ देखा नहीं जा सकता था कि गुंबद पर कौन चढ़ा था। इसके बाद फिर मेरा बयान रिकॉर्ड नहीं हुआ। सीबीआई ने कहा कि मैं अपने बयान से मुकर गया। अभियुक्तों के प्रेशर में आ गया। लेकिन, ऐसा बिल्कुल नहीं था।

यह फोटो 6 दिसंबर 1992 की है। इसे उस वक्त नार्दन-इंडिया पत्रिका और अमृत प्रभात अखबार के फोटो जर्नलिस्ट सुरेंद्र कुमार यादव ने खींचा था।

उपद्रवियों ने मेरा कैमरा छीन लिया था, पीटा भी; एफआईआर दर्ज करवाया पर कुछ नहीं हुआ

सुरेंद्र कुमार यादव उस वक्त नार्दन-इंडिया पत्रिका और अमृत प्रभात अखबार में फोटो जर्नलिस्ट थे। फिलहाल इलाहाबाद विश्वविद्यालय में फोटोग्राफी के टीचर हैं। सुरेंद्र यादव बताते हैं कि सीबीआई की विशेष अदालत ने बाबरी विध्वंस मामले में गवाही के लिए 4 साल पहले मुझे भी समन किया था।

क्या संयोग था, सामने जज के उच्च आसन पर विराजे जज सुरेंद्र कुमार यादव और इधर गवाह के रूप में सामने खड़ा मैं भी सुरेंद्र कुमार यादव। करीब तीन घंटे की गवाही के दौरान मेरा साक्ष्य रिकॉर्ड किया गया। इस दौरान जज साहब ने मेरे द्वारा बताए गए 6 दिसंबर 1992 के अयोध्या के घटनाक्रम को बड़े गौर से सुना।

वहां पता चला मेरी तरह कई अन्य पत्रकार जो 6 दिसंबर 1992 को मौके पर मौजूद थे, उनकी भी गवाही ली गई है। दुखद यह है कि बाबरी विध्वंस के दौरान अपनी ड्यूटी कर रहे प्रेस छायाकारों को बुरी तरह पीटा गया था, उनके कैमरे तोड़े और छीने गए थे, जिसमें मैं भी शामिल था।

इस बारे में राम जन्मभूमि थाने में 8 दिसंबर 1992 को मैंने एफआईआर भी दर्ज कराई थी, लेकिन उस पर क्या कार्यवाही हुई, आज तक पता नहीं। हिंसक कारसेवकों द्वारा छीना गया मेरा कैमरा भी नहीं मिल सका और ना ही उसकी कोई क्षतिपूर्ति हुई।

लिब्रहान जांच आयोग नई दिल्ली और सीबीआई की विशेष अदालत लखनऊ में मैं कई बार गवाही के लिए उपस्थित होने को विवश किया गया। एक बार तो मैं व्यस्तता के कारण गवाही के लिए जाने की स्थिति में नहीं था, तो सीबीआई ने अरेस्ट वारंट जारी करने तक की धमकी दे दी थी। बहरहाल आज फैसले का पता चलेगा। मुझे भी फैसले की बेसब्री से प्रतीक्षा है।



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Babri Masjid Demolition Truth | Here's Eyewitness Report Updates From Ayodhya


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