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ट्रम्प प्रशासन की विफलता से शांति समझौते को दिशा मिली; अब इसका चुनावी फायदा उठाने की कोशिश https://ift.tt/2ZTE3sc

अरब -इजराइल कूटनीति को चालीस साल से अधिक समय तक कवर करने के बाद मैं कह सकता हूं कि पिछले सप्ताह इजराइल और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और इजराइल और बहरीन के बीच हालात सामान्य बनाने के लिए हुए समझौते अत्यंत ही असामान्य तरीके, लेकिन बहुत ही खुलासा करने वाले अंदाज में हुए।

यहां पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की ‘शांति के न्यायमूर्ति’ की भूमिका का जिक्र नहीं करना चाहिए। हकीकत यह है कि इजराइल-अमीरात और इजराइल-बहरीन के बीच सामान्य रिश्तों की बहाली को ट्रम्प प्रशासन की इजराइल-फिलिस्तीन कूटनीति की लगातार विफलता की वजह से ही दिशा मिली।

मेरा नियम : मध्य एशिया में आप बड़ा परिवर्तन तभी हासिल करते हैं, जब बड़ी ताकतें गलत वजहों से कोई सही काम करते हैं। और यह सही कदम है। मिस्र और जॉर्डन ने भी इजराइल के साथ शांति स्थापित की, लेकिन व्यापार, पर्यटन और आपसी निवेश सीमित ही रहा। इजराइल व अमीरात और इजराइल व बहरीन अपने संबंधों को इसलिए सामान्य बनाना चाहते हैं, क्योंकि वे इन चीज़ों के साथ ही ईरान के खिलाफ इंटेलीजेंस इनपुट भी चाहते हैं।

सऊदी अरब पहले से ही इजराइल की एयर लाइंसों को अपने वायुक्षेत्र का इस्तेमाल करने की इजाजत देकर यह इनपुट पा रहा है। यह रोज नहीं होता। मेरे विचार में जो कुछ भी मध्य एशिया को यूरोपीय यूनियन की तरह अधिक और गृह युद्ध से जूझ रहे सीरिया की तरह नहीं बनाता है, वह अच्छा है।

मैं हर रात दुआ करता हूं कि ट्रम्प हार जाएं, लेकिन अगर वह और जैरेड कुशनेर (ट्रम्प के दामाद और एडवाइजर) इन समझौतों को आगे चलने में मदद करते हैं तो यह उनके लिए बेहतर है। मैं कोई अनुमान नहीं लगाना चाहता कि यह कैसा चलेगा, लेकिन जब अरब का तकनीकी तौर पर सबसे आधुनिक देश यूएई और क्षेत्र का सबसे तकनीकी तौर पर सक्षम गैर-अरब देश इजराइल समझौता करते हैं तो मुझे लगता हैं नई ऊर्जा उत्पन्न होगी और बेहतर ही होगा।

अगर यह सफल होता है तो ईरान के स्थायी विरोध मॉडल के समाधान का एक विकल्प होगा। क्योंकि इससे सिर्फ लेबनान, सीरिया, गाजा, इराक और ईरान जैसे विफल देशों को ही मदद मिली है। अब क्या हो रहा है? पहला, अमेरिका मध्य एशिया में अपनी सैन्य उपस्थिति तेजी से घटा रहा है। इसे भरने के लिए नए गठबंधन हो रहे हैं।

दूसरा, अब सुन्नी अरब देशों को समझ आ गया है कि फिलिस्तीन के सवाल पर एक-दूसरे को बाहर करके वे ज्यादा समय तक अपनी वैधता को बनाए नहीं रख सकते। उनका भविष्य अपने युवाओं को शिक्षा, व्यापारिक संबंध और वैश्विक संबंध उपलब्ध कराने पर ही निर्भर है। आज वे राजनीतिक बहुलवाद और मतभेदों को नकार रहे हैं, लेकिन आने वाले समय में उन्हें यह देना ही होगा। अभी उनके आधुनिकीकरण का मॉडल चीन है, अमेरिका नहीं।

वाशिंगटन इंस्टीट्यूट के अरब-इजराइल संबंधों के विशेषज्ञ डेविड मकोवस्की कहते हैं, ‘यूएई को लगता है इस समय अमेरिका से लाभ उठाने की उसकी क्षमता सर्वाधिक है, क्योंकि ट्रम्प अगला चुनाव जीतने के लिए किसी बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि की तलाश कर रहे हैं। अगर यूएई को अमेरिका से अत्याधुनिक एफ-35 जेट चाहिए, तो यही इन्हें पाने का सबसे उपयुक्त समय है। अमेरिका आठ सालों से इसे देने से इनकार कर रहा है।’

लेकिन इस डील का एक अनचाहा दुष्परिणाम यह भी है कि इसने यह साबित कर दिया है कि इजराइल की मौजूदा सरकार फिलिस्तीन के साथ दो देशों वाले समाधान को स्वीकार करने में अक्षम है। कुशनेर की इस योजना ने इजराइल के दक्षिणपंथी प्रधानमंत्री के सामने ऐसी दुविधा उत्पन्न कर दी है कि जिस योजना को बनाने में उन्होंने मदद दी उन्हें उसे नकारना भी पड़ सकता है।

कुशनेर का प्रस्ताव है कि इजराइल पश्चिमी तट से यहूदी बहुल 30% हिस्से को काट दे, जिससे फिलिस्तीनी बाकी 70% हिस्से में अपना देश बना सकें, जिसकी राजधानी येरुशलम के किनारे पर हो। लेकिन, नेतन्याहू के गठबंधन के कट्टरपंथी पूरे पश्चिमी तट की संप्रभुता बनाए रखने पर जोर दे रहे थे।

इसलिए नेतन्याहू ने सिर्फ 30% हिस्से को काटने की बात कही और 70% फिलिस्तीनियों को देने की कोई बात नहीं की। लेकिन ट्रम्प और कुशनेर ने इसे रोक दिया। इसके बाद यूएई की एंट्री हुई और उसने कहा कि अगर नेतन्याहू इस हिस्से को काटने की अपनी योजना को स्थगित करते हैं तो वह रिश्ते सामान्य बनाने को तैयार है।

अब इजराइल-फिलिस्तीन के मुद्दे का क्या होगा? मुझे संदेह है कि अंतरराष्ट्रीय शांति प्रक्रिया खत्म हो गई है। ट्रम्प इसमें तभी दखल देंगे, जब नेतन्याहू अपनी ही योजना को स्वीकार नहीं करेंगे। इसलिए फिलिस्तीन का मुद्दा बहुत हद तक इजराइल का अंदरूनी मसला बना रहेगा। पश्चिमी तट पर रहने वाले 25 लाख फिलिस्तीनियों के समक्ष कोई विकल्प न होने पर वे समान अधिकार और इजराइली नागरिकता की मांग कर सकते हैं।

यह इजराइल के यहूदी और लोकतांत्रिक चरित्र के लिए बड़ी चुनौती होगी। इजराइल-फिलिस्तीन का चाहे जो हो, लेकिन ट्रम्प-कुशनेर की शांति योजना अब तक की सबसे परिणामदायी योजना है। इसलिए नहीं कि इससे क्या हासिल हुआ, बल्कि इसने क्या खुलासा किया। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)



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थाॅमस एल. फ्रीडमैन, तीन बार पुलित्ज़र अवॉर्ड विजेता और ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ में नियमित स्तंभकार हैं।


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