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बाबरी मस्जिद का फैसला अगर उल्टा आता तो भारतीय लोकतंत्र और हिंदुत्व की राजनीति में जो स्वस्थ प्रवृत्तियां उभर रही हैं, वे शिथिल पड़ जातीं https://ift.tt/3cJzFRI

बाबरी मस्जिद को गिराने के बारे में अब जो फैसला आया है, उस पर तीखा विवाद छिड़ गया है। इस फैसले में सभी कारसेवकों को दोषमुक्त कर दिया गया है। कुछ मुस्लिम संगठनों के नेता कह रहे हैं कि यदि मस्जिद गिराने के लिए कोई भी दोषी नहीं है तो फिर वह गिरी कैसे? सरकार और अदालत ने अभी तक उन लोगों को पकड़ा क्यों नहीं, जो मस्जिद ढहाने के दोषी थे? जो सवाल हमारे कुछ मुस्लिम नेता पूछ रहे हैं, उनसे भी ज्यादा तीखे सवाल अब पाकिस्तान के नेता, अखबार और चैनल पूछेंगे। इस फैसले को लेकर देश में सांप्रदायिक असंतोष और तनाव फैलाने की कोशिशें शुरू हो गई हैं।

मान लें कि सीबीआई की अदालत श्री लालकृष्ण आडवाणी, डॉ. मुरलीमनोहर जोशी और उमा भारती जैसे सभी आरोपियों को सजा देकर जेल भेज देती तो क्या होता? पहली बात तो यह कि इन नेताओं ने बाबरी मस्जिद के उस ढांचे को गिराया है, इसका कोई भी ठोस या खोखला-सा प्रमाण भी उपलब्ध नहीं है। यह ठीक है कि ये लोग उस प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे थे लेकिन इनमें से किसी ने उस ढांचे की एक ईंट भी तोड़ी हो, ऐसा किसी फोटो या वीडियो में नहीं देखा गया।

इसके विपरीत इन नेताओं ने उस वक्त भीड़ को काबू करने की भरसक कोशिश की, इसके कई प्रमाण उपलब्ध हैं। आडवाणी जी ने तो सारी घटना पर काफी दुख भी प्रकट किया। यदि अदालत इन दर्जनों नेताओं को अपराधी ठहराकर सजा दे देती तो क्या होता? यही माना जाता कि ठोस प्रमाणों के अभाव में अदालत ने मनमाना फैसला दिया है लेकिन सवाल यह भी है कि वह मस्जिद जिन्होंने गिराई, उन्हें क्यों नहीं पकड़ा गया और सजा क्यों नहीं दी गई?

क्या किसी मंदिर या मस्जिद या गिरजे को कोई यों ही गिरा सकता है? क्या उसको गिराना अपराध नहीं है? यदि आप मानते हैं कि 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में यह अपराध हुआ है तो वे अपराधी कौन हैं? अदालत का कहना है कि सबूत बहुत कमजोर थे। नेताओं के रिकॉर्ड किए हुए भाषण अस्पष्ट थे, जिनका ठीक-ठाक अर्थ समझना मुश्किल था। जो फोटो सामने रखे गए, उनमें चेहरे पहचाने नहीं जा सकते थे।

अदालत तो ठोस प्रमाणों के आधार पर फैसला करती है। यदि प्रमाण कमजोर हैं तो इसमें अदालत का क्या दोष है? प्रमाण जुटाना तो सीबीआई का दायित्व है लेकिन उसके बारे में तो कहा जाता है कि वह पिंजरे का तोता है। मान लें कि सीबीआई ठोस प्रमाण जुटा लेती और जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा है कि बाबरी मस्जिद का ध्वंस कानून का भयंकर उल्लंघन था और भाजपा के इन नेताओं को सजा हो जाती तो क्या हो जाता? क्या मस्जिद फिर खड़ी हो जाती? जो दो-ढाई हजार लोग उसी विवाद के कारण मारे गए थे, क्या वे वापस आ जाते?

मंदिर-मस्जिद पर पिछले साल सर्वोच्च न्यायालय ने जो लगभग सर्वमान्य फैसला दिया है, क्या वह निरर्थक सिद्ध नहीं हो जाता? देश में क्या हिंद-मुस्लिम तनाव दोबारा नहीं बढ़ जाता? नागरिकता संशोधन कानून को लेकर देश में जो आंदोलन चल रहे थे, क्या उनका विरोध और तूल नहीं पकड़ता? यदि कुछ भाजपाई नेताओं को चार-पांच साल की सजा हो जाती तो क्या वे ऊंची अदालतों के द्वार नहीं खटखटाते?

पहले ही इस मुकदमे को तय होने में 28 साल लग गए। जिन 49 लोगों पर मुकदमा चला था, उनमें से 17 तो संसार से विदा हो गए हैं। उनमें पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी भी थे। इस मामले पर 2009 में लिबरहान आयोग ने 900 पृष्ठों की रपट तैयार करके दी थी। सीबीआई ने 850 गवाहों से बात करके 7000 दस्तावेज खंगाले थे। मान लें कि वर्तमान मोदी सरकार की जगह कोई और सरकार दिल्ली में बैठी होती और वह अदालत पर दबाव डलवाकर या सच्चे-झूठे कई प्रमाण जुटाकर इन आरोपियों को कठघरे में डलवा देती तो क्या भारतीय लोकतंत्र के लिए वह शुभ होता?

यदि राम मंदिर के नेताओं को जेल हो जाती तो सोचिए कि आज के भारत का हाल क्या होता? ज्यादातर नेता वरिष्ठ नागरिक हैं। जनता में उनके प्रति श्रद्धा है। यदि फैसला उनके खिलाफ जाता तो सोचिए कि देश में एक नया तूफान उठ खड़ा होता या नहीं होता? आजकल पूरा देश कोरोना की महामारी से जूझ रहा है, लद्दाख में फौजी संकट आन खड़ा है और कश्मीर में भी काफी उहापोह है, ऐसे हालात में बुद्धिमत्ता इसी में है कि यह फैसला किसी को कैसा भी लगे, फिर भी इसका स्वागत किया जाए।

इस मौके पर एक प्रासंगिक घटना यह भी हुई कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने बड़ी घोषणा कर दी। बड़ी इसलिए क्योंकि अनेक हिंदू साधु-संत संगठन मांग कर रहे हैं कि मथुरा व काशी में भी मस्जिदें हटाकर मंदिर बनाए जाएं। मोहनजी ने कहा है कि यह काम संघ की कार्यसूची में नहीं है। इसी तरह उन्होंने नागरिकता संशोधन कानून के बारे में भी कहा है कि पड़ोसी देशों के हर शरणार्थी का स्वागत किया जाना चाहिए, उसका मजहब चाहे जो हो। बाबरी मस्जिद का यह फैसला अगर उल्टा आ जाता तो भारतीय लोकतंत्र और हिंदुत्व की राजनीति में आजकल जो ये स्वस्थ प्रवृत्तियां उभर रही हैं, वे काफी शिथिल पड़ जातीं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)



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डॉ. वेदप्रताप वैदिक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष


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