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विधानसभा और अन्य राज्यों में हो रहे उपचुनावों में प्रचार को लेकर चुनाव आयोग ने सख्त नियम बनाए, लेकिन डिजिटल चुनावी प्रचार के आगे बेबस https://ift.tt/34fiCDn

मोबाइल युग के पहले 20वीं सदी में दूरदर्शन और आकाशवाणी से चुनावी भाषण देने के लिए राजनीतिक दलों में मारामारी रहती थी। 21वीं सदी में बड़े दलों से लेकर छुटभैये नेताओं के पास चुटकियों में तैयार यूट्यूब, फेसबुक और वॉट्सऐप का नेटवर्क, डिजिटल क्रांति का दिलचस्प पहलू है।

पहले गांधी मैदान और रामलीला मैदान में उमड़ी भीड़ से चुनावी लहर का आंकलन हो जाता था। अब सोशल मीडिया के माध्यम से विदेशी ताकतें भारत में चुनावी लहर बना व बिगाड़ सकती हैं। कोरोना और लॉकडाउन के दौर में बिहार विधानसभा और अन्य राज्यों में हो रहे उपचुनावों में प्रचार के बारे में चुनाव आयोग ने सख्त नियम बनाए हैं।

इनके अनुसार नामांकन के समय अधिकतम 2 लोग और रोड शो में अधिकतम पांच वाहनों की सीमा निर्धारित हुई है। इन प्रतिबंधों की काट को ढूंढते हुए सभी दलों ने डिजिटल से जनता को सम्मोहित करने का मंत्र हासिल कर लिया है।

चुनावों में डिजिटल और सोशल मीडिया का इस्तेमाल 2009 से ही शुरू हो गया था, लेकिन इस खेल के नियम बनने में 4 साल लग गए। सोशल मीडिया से चुनाव प्रचार को जवाबदेह बनाने और इसे चुनावी खर्चों में शामिल करने के बारे में केएन गोविंदाचार्य के प्रतिवेदन के बाद अक्टूबर 2013 में नियम बने। फिर लोकसभा के दो आम चुनाव समेत सभी राज्यों के विधानसभा चुनाव हुए, लेकिन इन नियमों का शायद ही कभी पालन हुआ हो।

परंपरागत चुनावी व्यवस्था में चुनावी पर्यवेक्षक अभी भी फूलमाला और चाय के खर्चों का हिसाब रखने में पूरा जोर लगा रहे हैं। लेकिन डिजिटल माध्यम से हो रहे खरबों रुपए के अवैध खर्च पर नियमों का कोई चाबुक नहीं चलता।

2019 के आम चुनावों में फेसबुक और गूगल जैसे प्लेटफार्म पर भाजपा ने लगभग 27 करोड़ रुपए और कांग्रेस ने लगभग 5.7 करोड रुपए अधिकृत तौर पर खर्च किए थे। लेकिन डिजिटल रैली, डाटा माइनिंग और आईटी सेल के इंफ्रास्ट्रक्चर पर हो रहे भारीभरकम खर्च का विवरण प्रत्याशी चुनाव आयोग को नहीं देते।

चुनावी नियमों के अनुसार प्रत्याशियों को अपनी अधिकृत ई-मेल और सोशल मीडिया अकाउंट्स का चुनावी हलफनामे में विवरण देना जरूरी है। लेकिन डिजिटल चुनावी प्रचार में नेताओं और पार्टियों के फैन्स क्लब के माध्यम से चुनावी खेल हो जाता है।

कर्नाटक के एमएलए टी राजा सिंह का मामला इसकी छोटी-सी नजीर है। सोशल मीडिया पोस्ट्स पर विवाद बढ़ने के बाद अकाउंट का ठीकरा नेता जी ने अज्ञात फैंस पर डाल दिया। सोशल मीडिया प्लेटफार्म में आभासी सफलता के लिए नेताओं द्वारा बोगस समर्थकों की खरीद-फरोख्त नई राजनीतिक संस्कृति बन गई है।

चुनावी नियमों के अनुसार मतदान के 48 घंटे पहले चुनावी प्रचार पूरी तरह बंद हो जाना चाहिए। इन नियमों को धता बताते हुए चुनावी समर के आखिरी चरण में सोशल मीडिया के माध्यम से चुनावी प्रचार की प्रचंडता और बढ़ जाती है।

सुदर्शन टीवी चैनल मामले में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जो हलफनामा दिया है, उसके अनुसार डिजिटल को भी प्रिंट व टीवी की तरह जवाबदेह मीडिया होना चाहिए। तो फिर चुनावी नियमों के अनुसार अखबार या टीवी में दिए गए विज्ञापन की तर्ज पर डिजिटल और सोशल मीडिया से दिए जा रहे चुनावी विज्ञापनों के पूर्व अप्रूवल का बंदोबस्त क्यों नहीं होना चाहिए?

फेक न्यूज, हेट स्पीच और पेड न्यूज के रंगारंग मसालों से भरपूर इस डिजिटल पिक्चर पर लगाम लगाने के लिए चुनाव आयोग ने भी अभी तक कोई संजीदा कोशिश नहीं की है। चुनावी अपराधों पर सख्त सजा मुकर्रर करने के लिए चुनाव आयोग ने ज्यादा अधिकारों के साथ कड़े कानून बनाने की मांग की है। लेकिन कृषि व श्रम सुधारों पर फुर्ती से कानून बनाने वाली सरकार ने चुनाव सुधारों पर कानून बनाने के बारे में कोई रोड मैप जनता के सामने नहीं रखा।

परंपरागत चुनाव प्रचार में जिला प्रशासन और चुनाव अधिकारी को प्रिंटर समेत किसी को भी गिरफ्तार करने का अधिकार है। लेकिन डिजिटल मीडिया के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के आगे चुनाव अधिकारी और जिला प्रशासन बौना-सा नजर आता है।

सोशल मीडिया कंपनियों के भारतीय अधिकारी पुलिस और अदालतों के सामने खुद को जवाबदेह नहीं मानते। इसके बावजूद चुनाव आयोग सोशल मीडिया कंपनियों के भारतीय अधिकारियों के साथ नियमित मीटिंग करता है। परंपरागत चुनावी प्रणाली में धन और बाहुबल के मर्ज को टीएन शेषन ने रोकने में सफलता हासिल की थी।

संविधान के अनुच्छेद 324 के अनुसार चुनाव आयोग को स्वतंत्र और निष्पक्ष कराने के लिए सभी प्रकार के अधिकार हैं। जिसके तहत डिजिटल मीडिया पर नियमों को लागू करने की इच्छाशक्ति उसे अभी हासिल करना बाकी है। डिजिटल चुनावी प्रचार को सफल बनाने के लिए वोटरों के डाटा की सप्लाई सोशल मीडिया कंपनियों के जरिए होती है।

कैंब्रिज एनालिटिका जैसे मामलों से साफ है कि डिजिटल कंपनियां अन्य थर्ड पार्टी एप्स के माध्यम से नेताओं व विदेशी शक्तियों के साथ डाटा शेयर करती हैं। इन कंपनियों के रिकार्ड्स की जांच करके डाटा की इस अवैध खरीद-फरोख्त का विवरण यदि चुनाव आयोग हासिल कर ले तो फिर जनता के वोट पर नेताओं के डिजिटल डाका पर प्रभावी रोक लग सकेगी। (ये लेखक के अपने विचार हैं)



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विराग गुप्ता. सुप्रीम कोर्ट के वकील।


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