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अगर देश के पहले प्रधानमंत्री का परनाती किसी दु:खी दलित के पैरों में गिर सकता है तो मुझे लगता है कि उम्मीद अभी बाकी है https://ift.tt/3iLeyA6

जब 19 साल की किसी दलित लड़की को उच्च जाति के राजनीतिक संरक्षण प्राप्त दबंग पड़ोसियों द्वारा गांव की सड़कों पर छेड़ा जाएगा, पीछा किया जाएगा, परेशान किया जाएगा और सेक्सुअली धमकाया जाएगा तो वह क्या करेगी? वह अपना सिर झुकाए तेजी से भागने की कोशिश करेगी। यही दलित लड़कियों को उनके माता-पिता द्वारा भी सिखाया जाता है। लेकिन वह भागकर कहां जाएगी?

600 परिवारों वाले इस गांव में दलितों के सिर्फ 15 घर हैं। ये सभी गरीब हैं और इतने गरीब कि वे आश्चर्यचकित हैं कि वे अब भी जिंदा हैं, जबकि देश में 60 लाख से अधिक लोग वायरस की चपेट में आ चुके हैं। कहीं कोई काम और कमाई नहीं है। हर कोई चिंतित है कि कल क्या होगा?

उसके राज्य में यौन अपराध आम बात है। सुरक्षित रहने के लिए उसने बाहर निकलना भी बंद कर दिया। वह नहीं जानती कि ये लोग क्या योजना बना रहे हैं। वह जानती है कि वे उसके घर को जला सकते हैं और उन्हें गांव से बाहर फेंक सकते हैं। विरोध करने वाले दलितों के साथ वे यही तो करते हैं।

परिवार पुलिस के पास गया पर किसी ने नहीं सुना। जब आप उत्तर प्रदेश में एक दलित के रूप में पैदा होते हैं तो आपको अपमान और शर्म की जिंदगी स्वीकार करनी पड़ती है। अगर आप लड़की हैं तो यह और भी खराब होता है। संक्षेप में वह जानती है कि क्या इंतजार कर रहा है।

यह चौंकाने वाली बात नहीं होती है, जब एक दिन वह अपनी गायों को चराने के लिए जाती है तो उसकी मां को वह खून से लथपथ अधमरी हालत में मिलती है। उसकी जीभ कटी होती है और रीढ़ टूटी होती है। मां बेटी के नग्न शरीर को कपड़े से ढंकती है, ताकि उसे शर्मिंदा न होना पड़े।

वह पहले अलीगढ़ फिर दिल्ली के एक अस्पताल में कई दिन मौत से लड़ती है। 22 सितंबर को एक मजिस्ट्रेट को दिए बयान में वह ऊंची जाति के चार लोगों का नाम लेती है, आरोप लगाती है कि उन्होंने उसके साथ 14 सितंबर को सामूहिक दुष्कर्म किया। 29 सितंबर को उसकी मौत हो जाती है।

मृत्यु पूर्व दिया गया यह बयान जब न्यायालय के सामने आएगा तो क्या हुआ था, इस बारे में और अधिक जानकारी मिलेगी। लेकिन, नई दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल द्वारा जारी शव परीक्षा रिपोर्ट में गला घोंटने, गर्दन में चोट, घावों में मवाद और हृदयाघात का जिक्र है।

पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में कहा गया है कि उसके गुप्तांग पर गंभीर चोट थी। उत्तर प्रदेश पुलिस इन आरोपों को नकार रही है। उसका दावा है कि कोई शुक्राणु नहीं मिला। लेकिन वह यह नहीं बता रही कि उसने साक्ष्य 11 दिन के बाद एकत्र किए, जबकि नियमानुसार यह 96 घंटे के भीतर होना चाहिए।

राष्ट्रीय क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट में यूपी में हर 16 मिनट पर एक दुष्कर्म दर्ज होता है। जबकि, शर्म या डर के कारण अधिकांश दुष्कर्मों की रिपोर्ट ही नहीं होती। पुलिस भी ऐसे मामले दर्ज करने से बचती है। इससे अनुमान लगा सकते हैं कि असल में हर चार मिनट में एक दुष्कर्म होता है।

पिछले साल दर्ज अपहरण के 1,08,025 मामलों में 84,921 महिलाओं के थे, जिनमें 55,370 लड़कियों और बच्चों से जुड़े थे। राज्य में कुल अपराधों का 14.7% महिलाओं के खिलाफ था। यही नहीं गरीब, दलितों और मुस्लिमों के खिलाफ अपराधों को दर्ज करने में राज्य की छवि पहले ही खराब है। लेकिन पुलिस को ही दोष क्यों दें?

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अब तक पीड़ित परिवार से मिलने नहीं पहुंचे हैं। वह दलितों का साथ देते नहीं दिखना चाहते, जबकि कथित आरोपी उनकी ही जाति के हैं। इस कहानी को रोकने के लिए ही हाथरस में पहले मीडिया और विपक्षी नेताओं को नहीं जाने दिया गया। राहुल गांधी को गिरफ्तार कर लिया गया।

प्रियंका से धक्कामुक्की हुई और पुलिस ने उनके कपड़े खींचे। यह इतना अधिक था कि कई भाजपा नेताओं ने इसकी यह कहकर आलोचना की कि यह किसी महिला से व्यवहार का तरीका नहीं है। यह वही पुलिस थी, जिसने सामुहिक दुष्कर्म को दबाने की कोशिश की, लड़की के शव को अस्पताल से लिया और परिवार को सौंपने की बजाय परिवार को बंद करके रात को ही शव जला दिया।

प्रधानमंत्री इस पर कुछ नहीं बोले। यह दुर्भाग्यपूर्ण है, क्योंकि वे ऐसे नेता हैं, जिन्हें देश तब भी सुनता है, जब उसे चोट पहुंचाई जा रही हो। उनका एक बयान भी बड़ा अंतर पैदा कर सकता था। परिवार को धमकाने वाले जिलाधिकारी को हटाया जा चुका है। परिवार को बयान बदलने पर मदद के रूप में रिश्वत की पेशकश करने वाले भी जा चुके हैं। दुष्कर्मियों के समर्थन में नारे लगाने वाले ठाकुर जानते हैं कि उन्हें कोई हाथ नहीं लगा सकता।

इस सबके बीच, जिस फोटो पर मुझे सर्वाधिक गर्व है वह राहुल गांधी का है। जिसमें वे दलित लड़की के पिता के पैरों पर झुके हैं और उनका माथा उनके घुटनों को छू रहा है। ऐसा लग रहा है कि मानो वे उन सभी की तरफ से माफी मांग रहे हों, जो ऐसे अपराधों के बार-बार होने पर भी चुप रहे। नहीं, यह राजनीति नहीं है। कुछ ऐसी चीजें हैं, जो राजनीति से अलग हैं और होनी भी चाहिए। अगर देश के पहले प्रधानमंत्री का परनाती किसी दु:खी दलित के पैरों में गिर सकता है तो मुझे लगता है कि उम्मीद अभी बाकी है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)



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प्रीतीश नंदी, वरिष्ठ पत्रकार व फिल्म निर्माता


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