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68 साल के इतिहास में चुनावी हिंसा में सबसे ज्यादा मौतें 1990 में हुई, 2015 का चुनाव सबसे कम हिंसक रहा https://ift.tt/2IgmgW2

बिहार में 4 नवंबर को भाकपा (माले) के समर्थक प्रमोद दास को जदयू समर्थक चिरंजन सिंह ने गोली मार दी। प्रमोद का कुसुर सिर्फ इतना था कि उसने महागठबंधन की जीत का दावा किया था। इसी दिन कल्याणपुर सीट से युवा क्रांतिकारी दल के उम्मीदवार संजय दास को भी बदमाशों ने गोली मारकर जख्मी कर दिया। इससे पहले शिवहर सीट से जनता दल राष्ट्रवादी पार्टी के उम्मीदवार श्रीनारायण सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई। ये कुछ घटनाएं हैं, जो बताती हैं कि बिहार में चुनावी हिंसा अब भी उतनी कम नहीं हुई हैं, जितना दावा किया जाता रहा है।

जब से चुनाव होने शुरू हुए, तब से ही हिंसा हो रही

बिहार में चुनावी हिंसा का इतिहास पहले चुनाव से ही जुड़ा है। बिहार में पहली बार 1951-52 में विधानसभा चुनाव हुए थे। उस समय कांग्रेस का ही राज था। चुनावों में अक्सर कांग्रेस और उसके खिलाफ खड़े उम्मीदवारों के बीच आए दिन मुठभेड़ होती रहती थी। उस समय असली लड़ाई कांग्रेस और कम्युनिस्टों के बीच थी। पहले चुनाव में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने भाकपा के उम्मीदवार कार्यानंद शर्मा को बुरी तरह पीटा था।

1952 से 1967 तक चुनावों में छुटपुट हिंसा की खबरें ही आती रहीं। लेकिन, 1969 के चुनाव में पहली बार पूरे बिहार में हिंसा की घटनाएं हुईं। इस चुनाव में 7 लोगों की मौत हुई। इस चुनाव में गरीबों और हरिजनों को तो वोट ही नहीं डालने दिया गया।

1977 में चुनावी हिंसा की घटनाएं तेजी से बढ़ीं। इस चुनाव में 194 घटनाएं हुईं, जिसमें 26 लोग मारे गए थे। 1985 में अब तक की सबसे ज्यादा 1,370 हिंसक घटनाएं हुई थीं, जिसमें 69 लोग मारे गए थे। हालांकि, 1990 के चुनाव में 520 घटनाओं में 87 लोगों की मौत हुई थी। 1995 में 1,270 घटनाएं घटीं, जिनमें 54 मौतें हुईं। जबकि 2000 के चुनाव में 61 लोग मारे गए थे।

2005 के बाद चुनाव आयोग की सख्ती के कारण चुनावी हिंसाओं में कमी आई और इनमें मरने वालों की संख्या भी काफी हद तक कम हो गई। फरवरी और अक्टूबर 2005 के चुनाव में 17 मौतें हुई थीं। 2010 में 5 लोगों की मौत हुई। जबकि, 2015 में किसी की मौत नहीं हुई।

पहली राजनीतिक हत्या 1965 में हुई थी

बिहार में राजनीतिक हत्या की पहली घटना 1965 में हुई थी। उस समय कांग्रेस से पूर्व विधायक शक्ति कुमार की हत्या कर दी गई थी। उनका शव तक नहीं मिला था। शक्ति कुमार दक्षिणी गया से विधायक रहे थे। शक्ति कुमार की हत्या के बाद 1972 में भाकपा विधायक मंजूर हसन की हत्या MLA फ्लैट में कर दी गई थी। 1978 में भाकपा के ही सीताराम मीर को भी मार दिया गया। 1984 में कांग्रेस के नगीना सिंह की हत्या हो गई।

जानकार मानते हैं कि बिहार में राजनीतिक हत्याओं के पीछे की वजह बाहुबलियों को तवज्जो देना है। राजनीतिक हिंसा और हत्या के दौर में बिहार में कई नेताओं की जान गई। जुलाई 1990 में जनता दल के विधायक अशोक सिंह को उनके घर पर ही मार दिया। फरवरी 1998 की रात को विधायक देवेंद्र दुबे की हत्या हो गई। इसी साल विधायक बृजबिहारी प्रसाद की भी हत्या हो गई। अप्रैल 1998 में माकपा के विधायक अजीत सरकार की दिनदहाड़े हत्या कर दी गई। अजीत सरकार की हत्या के मामले में तो बाहुबली नेता पप्पू यादव को उम्रकैद की सजा भी मिली थी। हालांकि, बाद में सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया।

केंद्र सरकार की एजेंसी NCRB का डेटा बताता है कि बिहार में आज भी राजनीतिक हिंसाओं में राजनीतिक हत्याओं का सिलसिला थमा नहीं है। 2019 में ही बिहार में 62 राजनीतिक हिंसा की घटनाएं हुई थीं, जिसमें 6 लोग मारे गए थे।

सोर्सः वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत की किताब ‘बिहार में चुनावः जाति, हिंसा और बूथ लूट’, कमल नयन चौबे की किताब ‘बिहार की चुनावी राजनीतिः जाति वर्ग का समीकरण (1990-2015), चुनाव आयोग और मीडिया रिपोर्ट्स’



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तस्वीर मुंगेर में भड़की हिंसा की है। यहां 28-29 अक्टूबर की रात को दुर्गा प्रतिमा विसर्जन के दौरान भीड़ और पुलिस के बीच झड़प हो गई थी। बाद में इसको लेकर मुंगेर में हिंसक प्रदर्शन हुए थे।


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