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90 साल की दुर्गा कहती हैं 'मेरी उम्र के लोग आखिरी बार वोट करते हैं, मेरा पहला और आखिरी वोट एक साथ हो रहा' https://ift.tt/2JSTQm7

लोकतंत्र में संघर्ष की कहानियां क्या होती हैं, इसकी जिंदा मिसाल जम्मू के DDC (डिस्ट्रिक्ट डेवलपमेंट काउंसिल ) चुनावों के तीसरे दौर में तब दिखीं जब 70 सालों से संघर्ष कर रहे उन लोगों ने भी वोट डाले, जिन्होंने कभी पोलिंग बूथ नहीं देखा था। ये पश्चिमी पाकिस्तानी रिफ्यूजी हैं तो भारतीय लेकिन उनके नाम के साथ 'पाकिस्तानी' ऐसा जुड़ा कि उन्हें जम्मू कश्मीर में नागरिक का अधिकार पाने के लिए तीन पीढ़ियों तक इंतजार करना पड़ा।

भारत 1947 को आजाद हुआ, आज मैं आजाद हुआ हूं' अपने जीवन में पहली बार वोट डालने वाले 80 साल के वीरू राम ने अपनी उंगली पर लगी स्याही दिखाते हुए कहा। 1940 में पाकिस्तान के सियालकोट में जन्मे वीरू बंटवारे के बाद भारत के जम्मू कश्मीर में तो आ गए लेकिन, वोटिंग अधिकार पाने के लिए उन्हें 70 सालों तक इंतजार करना पड़ा। इस दौरान उनके माता-पिता नहीं रहे, कई भाई और बहन भी चल बसे।

वो कहते हैं, 'खुशकिस्मत हूं जो मुझे यह दिन दिखने को मिला। आज मैं, मेरे बच्चे और नाती पोते, सब वोटिंग कर रहे हैं। क्षेत्र अलग-अलग हैं, लेकिन हम सब फर्स्ट टाइम वोटर हैं। आज लग रहा है कि वर्षों के संघर्ष का फल मिला है।'

जम्मू कश्मीर से आर्टिकल 370 जाने के बाद जम्मू के अलग-अलग जिलों में रह रहे पश्चिमी पाकिस्तानी रिफ्यूजियों में 90 साल की दुर्गा देवी भी थीं और 84 साल के हंसराज भी। 40 साल के रोशन लाल कहते हैं, आज की वोटिंग मेरे लिए ऐसी है मानो देश की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह आजाद भारत की नई सुबह देखते।

मेरी उंगली पर लगी नीली स्याही का मतलब है नागरिकता, मगर यह आसान नहीं था, इसके लिए कई बार खाई लाठियां हैं, कई बार जेल गए हैं, मंत्रियों नेताओं के दफ्तरों के बहार भूखे-प्यासे कई दिन चक्कर काटे हैं, सालों की मेहनत हैं। परिवार और हमारे समाज के कई लोग यह दिन देखने को जिंदा भी नहीं रहे। मगर आखिरकार यह दिन आया है। बहुत खुश हैं। रौशन लाल का परिवार पाकिस्तान से आकर जम्मू के भलवाल ब्लॉक के बरन में बसा था।

90 साल की दुर्गा देवी अच्छे से बोल-चल नहीं सकती लेकिन वोट डाला। वह कहती हैं 'मेरी उम्र के लोग आखिरी बार वोट करते हैं, मेरा पहला और आखिरी वोट एक साथ होगा, बहुत तमन्ना थी पोलिंग स्टेशन देखने की, आज देखा भी और वोट भी डाला।

पोलिंग बूथ पर नाचे वोटर

जम्मू के सीमावर्ती मढ़ ब्लॉक का चक जाफर गांवों का पोलिंग बूथ और नजारा ऐसा था, मानो शादी ब्याह का समारोह हो या फिर कोई उम्मीदवार आज ही जीत गया हो। लेकिन असल कहानी कुछ और थी। पश्चिमी पाकिस्तानी रिफ्यूजी पहली बार वोट डाल रहे थे। और हर कोई वोट डालकर नाचता दिखा। लोकतंत्र में ऐसा नजारा अपने आप में अद्भुत था।

कौन हैं पश्चिमी पाकिस्तानी रिफ्यूजी

भारत के विभाजन के समय पाकिस्तान के स्यालकोट और लाहौर जिलों से बड़ी संख्या में हिन्दू समाज ने उत्तर भारत के दो बड़े सीमावर्ती प्रदेशों पंजाब और जम्मू कश्मीर की और पलायन किया था। उस समय जो परिवार पंजाब चले गए और वहां से फिर दिल्ली, राजस्थान या गुजरात।

वह भारत के संविधान के तहत देश के नागरिक हो गए। उन्हें वह सब सुविधाएं मिल गईं जो भारत के दूसरे नागरिकों को मिलती थीं। लेकिन 13 हजार से ज्यादा परिवार जो जम्मू आए, उन्हें 370 के रहते न तो वोट डालने के अधिकार मिले, न सरकारी नौकरी और ना ही जमीन या घर खरीदने का हक।



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90-year-old Durga says, 'People of my age vote for the last time, my first and last vote is happening simultaneously


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