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नए साल में लोग मसाला फिल्में थिएटर में और एक्सपेरिमेंट वाला सिनेमा घर पर अपने मोबाइल पर देखेंगे https://ift.tt/2KBORGN

जैसे कहानियों या एक ही तरह के लेखन का संग्रह किताबों में आता है, जिसे एंथोलॉजी कहते हैं। वैसे ही फिल्म एंथोलॉजी का चलन बढ़ा है। इसकी शुरुआत ‘बॉम्बे टॉकीज, ‘घोस्ट स्टोरीज’ वगैरह से हुई थी। अब निखिल आडवाणी के बैनर की ‘अनपॉज्ड’ आ रही है। इस तरह की किस्सोगाई अब काफी पॉपुलर हो चुकी है। यह आज के माहौल में सबसे उपयुक्त है। वह इसलिए कि एक ही प्रोजेक्ट में चार-पांच डायरेक्टरों की कहानियां होती हैं, जिसे शूट करने से लेकर पोस्ट प्रोडक्शन आदि में कम समय और संसाधन लगते हैं।

एंथोलॉजी वाले फॉर्मेट की खूबी यह भी है कि अलग-अलग नजरिए से अलग-अलग कहानियां कही जाती हैं। इस तरह एक कालखंड में हुए बदलावों को बेहतर तरीके से दिखाना मुमकिन हो जाता है। अब जैसे ‘अनपॉज्ड’ की ही बात करें, तो इसमें भी चार-पांच कहानियां हैं, जो कोरोना के बाद सबकी जिंदगी में आए बदलावों को अपने तरीके से दिखाएंगी। मजे की बात है कि इनके डायरेक्टरों ने आपस में अपनी कहानियों की जानकारी एक-दूसरे को नहीं दी थी। उन सभी ने बताया कि कैसे एक-एक कहानी पर महज दस-दस लोगों के क्रू मेंबर्स की मदद से शूटिंग को अंजाम दिया गया।

‘अनपॉज्ड’ में सभी कहानियां रोचक नोट पर खत्म होती हैं, उसके पीछे शायद मसला यह होगा कि लोग वैसे ही बड़े दु:खी हैं तो उन्हें और क्यों दु:खी करें। बहरहाल मुझे लगता है कि एंथोलॉजी रोचक तरीका है। यहां डायरेक्टर को महज 20-25 मिनट में बात कहनी होती है, जो चुनौतीपूर्ण है। मसलन, ‘लस्ट स्टोरीज’ में दिबाकर, करण आदि की कहानियां अच्छी थीं। करण जौहर की कहानी में काफी ह्यूमर था।

हालांकि मुझे नहीं लगता कि इस फॉर्मेट को लोग थिएटरों में देखेंगे। वहां तो फिल्मों में एक संपूर्ण कहानी ही लोगों को चाहिए होगी। वह इसलिए कि शॉर्ट फिल्मों की कहानियां तो गूगल पर ढेरों मिल जाएंगी। हां, डिजिटल प्लेटफॉर्मों के लिए ऐसा तरीका परफेक्ट है। यहां एक साथ लोग निखिल आडवाणी, अविनाश अरुण, नित्या मेनन, तनिष्ठा चटर्जी, राज एंड डीके से लेकर बाकी डायरेक्टरों की कहानियां एक जगह देख लेंगे।

एंथोलॉजी में कई बार कहानियां एक दूसरे से बिल्कुल अलग होती हैं। यही मजा है, एक बार में पांच फिल्मों को देखने में। ‘अनपॉज्ड’ में मुझे अच्छी चीज लगी कि रिश्तों की बातें हैं कि इस दौर में हमने क्या खोया और क्या पाया है। हल्के-फुल्के पॉजिटिव नोट पर फिल्में खत्म होती हैं। वह इसलिए कि अभी तो फिलहाल लोग दु:खद अंत वाली चीजें नहीं देखना चाहते हैं।

नए साल में तो एक्टर्स के पास काफी काम है। पंकज त्रिपाठी ने जैसे कहा, उनका तो अगला साल ही पूरा बिजी है। वह इसलिए कि इस बरस उनके 8 से 9 महीने खाली बैठे हुए गए हैं। मुझे लगता है कि अगले साल हर कोई व्यस्त ही रहने वाले हैं। नए साल में अगर सिनेमाघर खुलते हैं, तो वहां मसाला फिल्में चलेंगी। जो एक्सपेरिमेंट वाला सिनेमा होगा, वह घर पर देखेंगे, मोबाइल पर देखेंगे। इन सब बातों का पता हमें क्रिस्टोफर नोलन की ‘टेनेट’ से चला। उसे देखने काफी लोग गए। वह इसलिए कि वह स्मॉल स्‍क्रीन एक्सपीरियंस होगा ही नहीं।

यह जरूर है कि सिनेमाघरों में बिग बजट फिल्में ही देखने लोग आएंगे। फोन आदि पर बाहुबली, डनकर्क या 1917 जैसी विजुअल फिल्में नहीं आएंगी। वह सिनेमाघरों में आएंगी। यह बात भी है कि राजामौली जैसे डायरेक्टर छोटे बजट में तो सोच ही नहीं सकते। उनका स्केल बड़ा ही रहने वाला है।

एक और चीज महसूस हो रही है कि साउथ से बड़ी फिल्मों की अनाउंसमेंट खूब हो रही है। हिंदी में इन दिनों मेगा बजट फिल्मों के ऐलान नहीं हो रहे हैं। यहां लोग सहमे हुए लग रहे हैं। दरअसल इस साल बॉलीवुड जरा बुझा हुआ सा लग रहा है। सहमा हुआ है। इतनी नकारात्मकता आ गई है। अच्छे कलाकार गुजर गए हैं। इतनी ट्रैजेडी हुई है, जो इंडस्ट्री की ऊर्जा धीमी पड़ गई है। यह तब खत्म होगा, जब सिनेमाघर खुलेंगे और लोग टूटकर वहां जाएंगे। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)



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अनुपमा चोपड़ा, संपादक, FilmCompanion.in


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