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किसानों पर लाठीचार्ज की घटना ने आम किसान के मन में यह भाव जगा दिया था कि सरकार उनकी बात सुनने को तैयार नहीं https://ift.tt/342HVcn

सभी संगठन चाहे वो सरकार हो, कोई निजी व्यवसाय हो या छोटा व्यवसायी, सभी को अपने सपनों को हकीकत में बदलने के लिए प्लानिंग की जरूरत होती है। इसलिए जब वे प्लानिंग करते हैं तो तय करते हैं कि क्या करना है, कैसे करना है और कब करना है। यही तरीका प्रदर्शन करने वाले संगठनों पर भी लागू होता है, यदि उन्हें बड़ी संख्या में समर्थकों के साथ लंबे समय तक विरोध प्रदर्शन जारी रखना है। जैसा कि दिल्ली के नजदीक सिंघु बॉर्डर पर पिछले 15 दिनों से चल रहा है।

यदि इतने बड़े विरोध प्रदर्शन में हर कोई एक ही स्वर में वही बात दोहरा रहा है बगैर एक भी शब्द बदले तो ये बिलकुल स्पष्ट है कि शीर्ष से नीचे तक संवाद है, जिसमें एक 12 वर्षीय बच्चे से लेकर गृहिणी तक शामिल है। और इस संवाद में निश्चित रूप से दो भावनाएं थीं- ‘डर और उम्मीद’। अपनी जमीन हमेशा के लिए खोने का डर और इसे भविष्य की नस्लों के लिए बचाए रखने की उम्मीद।

दैनिक भास्कर ने एक शीर्षस्थ व्यक्ति से पंजाब के सभी 12,600 गांवों में रहने वाले हजारों-हजार लोगों तक पहुंचने वाले इस संवाद के प्रवाह के चार्ट और इस लक्ष्य को हासिल करने में लगे समय का पता लगाने का फैसला किया।

प्रदर्शनों की शुरुआत 90 दिनों पहले तब हुई, जब हरियाणा के पीपली में नए कानूनों का विरोध कर रहे किसानों पर लाठीचार्ज हुआ। इस घटना ने आम किसान के मन में यह भावना जगा दी कि सरकार उनकी बात सुनने के लिए तैयार नहीं है। इस अंडर-करंट को मुखर रूप से मध्यम और ब्लॉक स्तर के नेताओं ने महसूस किया।

क्योंकि, हर परिवार से कम से कम एक सदस्य किसी न किसी तरह खेती से जुड़ा हुआ है। फिर इन लोगों ने एक जागरूकता कार्यक्रम चलाकर हर ग्रामीण का समर्थन जुटाने का फैसला किया। और यहीं से असल प्लानिंग शुरू हुई कि क्या बोलना है? कैसे बोलना है? और कब बोलना है? लगभग सभी 31 संगठन जो कि समाज के विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व करते हैं, यूनाइटेड फार्मर्स फ्रंट यानी संयुक्त किसान मोर्चा के एक झंडे तले जमा हुए।

थोड़े ही समय में पेट्रोल पंप मालिक संघ, बार एसोसिएशन, शिक्षक संघ, डेयरी एसोसिएशन और पूर्व-सैनिक संघ जैसे सैकड़ों छोटे-बड़े संगठन इनके समर्थन में आ गए। हर पांच ब्लॉक के लिए जिला अध्यक्ष का पद बनाया। हर ब्लॉक में कई समितियां थीं। हर समिति में पांच सदस्य थे और हर समिति को 150 ग्रामीणों की जिम्मेदारी दी गई।

इसके हर गांव से कुशल वक्ताओं की पहचान की गई और उनके सहयोग के लिए कुछ और सदस्य जोड़े। इन लोगों को घर-घर जाकर बैठकर संदेश देने के लिए कहा गया। इन संवादवाहकों ने हर घर से एक व्यक्ति को चुना और उसके भीतर ‘डर और उम्मीद’ की भाषा का संचार किया।

दूसरे राज्यों से आने वाले नियमित प्रवासी मजदूर, भू-स्वामी, छोटे व्यवसायी और खासतौर पर सप्लाई चेन के भूमिहीन खेत मजदूरों को बताया गया कि किस प्रकार नए कानूनों की वजह से अर्थव्यवस्था में ठहराव आएगा और उनकी दैनिक मजदूरी खत्म हो जाएगी।

इसके अलावा इस सामूहिक उद्देश्य के लिए हर घर से कम से कम एक व्यक्ति को भेजने और हर गांव से कम से कम एक ट्रैक्टर देने को कहा गया। इसके बाद अलग-अलग स्तरों पर वॉट्सऐप ग्रुप बनाए गए, जिनके जरिए रोजाना वीडियो के साथ जानकारियों का आदान-प्रदान किया गया। इस प्रकार जीवन के हर क्षेत्र से जुड़ा व्यक्ति एक ही भाषा बोलने लगा।

जब पंजाब में आंदोलन की शुरुआत हुई, संवाद की ये रणनीति अपने पूरे शबाब पर थी और नेताओं ने महसूस किया कि उनकी ‘भाषा’ अंतिम आदमी तक पहुंच गई है। यह वह समय था जब राज्य स्तरीय प्रदर्शन दो माह में भी केंद्र सरकार का ध्यान आकर्षित नहीं कर पाया था।

तब सभी संगठनों के नेता एकमत से इस बात के लिए सहमत हुए कि उन्हें केंद्र सरकार का ध्यान अपनी मांगों की तरफ आकर्षित करने के लिए दिल्ली की तरफ कूच करना चाहिए, और इसकी तारीख तय हो गई। इसलिए, जब गुरुवार को हड़ताल अपने 15 वें दिन पर पहुंची तो न केवल विरोध प्रदर्शन का आकार बढ़ गया, बल्कि इसे सबसे लंबा हाईवे प्रदर्शन बनाने के लिए आते जा रहे लोग भी एक जैसी भाषा बोल रहे हैं।

युवाओं को संगीत से लुभाया

आम भाषा में या व्यंगात्मक शैली में पंजाबी युवाओं को ऐसे समूह के रूप में संदर्भित किया जाता है जिन्हें केवल दो चीजें आती हैं- खाना और नाचना। यह उनकी सांस्कृतिक पहचान है। चाहे इसे उनकी कमजोरी कहें या फिर जीने का तरीका। आप उनके दिल से संगीत अलग नहीं कर सकते।

और यही कारण है कि प्रदर्शनकारियों ने हिम्मत संधू, कंवर ग्रेवाल, जस भाजवा और मनमोहन वारिस जैसे म्यूजिक इंडस्ट्री से जुड़े गायकों से संपर्क साधा, जो युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय थे। क्रांतिकारी गीत लिखने के लिए खासतौर पर गीतकारों को नियुक्त किया गया।

चूंकि इतिहास दावा करता है कि पंजाब ने 18 से ज्यादा बार दिल्ली को जीता है, तो हर गीत में ‘दिल्ली’ शब्द था, जिससे किसान नेताओं का लगता था कि वह युवाओं की भावनाओं को जगा देगा। तो जब ‘किते कही वाले मोडे ते बंदूक ना आ जे, एन्ना दिल्लीए तू खयाल कर लईं (हल वाले कंधे पर बंदूक ना आ जाए, दिल्ली तू इसका ध्यान रखना) जैसे गीत जब लाउडस्पीकर पर बजाए जाते हैं तो एनएच-44 पर खड़े युवा इसके सुर में सुर मिलाने लगते हैं।

और जब ‘लैके मुड़ांगे पंजाब असीं हक दिल्लीए’ (हम अपना हक लेकर ही पंजाब वापस जाएंगे ऐ दिल्ली) जैसे गीत बजते हैं तो हर युवा अपनी छाती ठोकने लगता है। प्रदर्शनकारियों ने युवाओं को लगातार मोटिवेट करने के लिए नए-नए गीत बनाने और ऊंचे सुरों में बजाने जारी रखे हैं। इनके बोलों में प्रदर्शन की रोजमर्रा के घटनाक्रम की भी जानकारी दी जा रही है।

(मनीषा भल्ला के इनपुट के साथ)



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90 days ago when the incident of lathi charge on farmers protesting against the new laws in Haryana aroused the feeling of the common farmer that the government was not ready to listen to him.


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