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किसान कहते हैं- अब लोकतंत्र का मतलब कॉर्पोरेट का राज, कॉर्पोरेट के द्वारा, कॉर्पोरेट के लिए हो गया https://ift.tt/3nbF4FQ

केंद्र से आया प्रस्ताव ठुकराने के साथ ही किसानों ने अडानी-अंबानी के खिलाफ भी मोर्चा खोल दिया है। ‘अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति’ की तरफ से जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि वे ‘सरकार की असली मजबूरी, अडानी-अंबानी जमाखोरी’ जैसे नारों को अब जन-जन तक पहुंचाने का काम करेंगे और इन दोनों कॉर्पोरेट घरानों के तमाम प्रोडक्ट्स का बॉयकॉट पूरे देश में किया जाएगा।

ये पहली बार नहीं है, जब इस किसान आंदोलन में ये दोनों कॉर्पोरेट घराने प्रदर्शनकारियों के निशाने पर आए हैं। करीब तीन महीने पहले जब यह आंदोलन पंजाब और हरियाणा तक सीमित था, तब भी सरकार के साथ ही अडानी-अंबानी ग्रुप के खिलाफ प्रदर्शन जारी ही चुके थे। प्रधानमंत्री मोदी पर सीधा निशाना साधते हुए ‘धर्म दा न साइंस दा, मोदी है रिलायंस दा’ जैसे नारे तब भी पंजाब के अलग-अलग शहरों में खूब गूंज रहे थे।

पंजाबी में कहे गए इस नारे का मतलब है कि प्रधानमंत्री मोदी न तो धर्म से सरोकार रखते हैं और न ही विज्ञान से, वे सिर्फ रिलायंस (कॉर्पोरेट) से सरोकार रखते हैं।

इस नारे के साथ ही सोशल मीडिया से लेकर पंजाब की सड़कों पर भी जो इसी तरह का दूसरा नारा खूब चर्चित हो रहा था, उसमें काफी रचनात्मक तरीके से कहा गया था कि मौजूदा सरकार को सिर्फ एक ही सरगम सुनाई देती है जो कहती है, ‘सा रा ध न अं बा नी का, ध न सा रा अ डा नी का’

किसान नेता गुरनाम सिंह चढूनी और डॉक्टर दर्शन पाल इस आंदोलन के प्रमुख चेहरे हैं।

'सरकार पूरे देश को कॉर्पोरेट के हवाले करने की दिशा में काम कर रही है'

इन दोनों कॉर्पोरेट घरानों का ये विरोध सिर्फ नारों और सोशल मीडिया तक ही सीमित नहीं रहा है बल्कि पंजाब के कई शहरों में प्रदर्शनकारियों ने रिलायंस के पेट्रोल पंप से रिलायंस के तमाम स्टोर्स और अडानी ग्रुप के एग्रो आउटलेट्स का बहिष्कार किया है, मुकेश अंबानी के पुतले जलाए हैं और भारी संख्या में जियो के सिम तोड़े हैं और अपने नंबर किसी अन्य नेटवर्क में पोर्ट करवाए हैं। इसी तरह के विरोध को अब पूरे देश में फैलाने की बात किसान कर रहे हैं।

ऐसे में सवाल उठता है कि किसान तमाम कॉर्पोरेट घरानों में से सिर्फ अडानी और अंबानी ग्रुप को ही निशाना क्यों बना रहे हैं? इस सवाल का जवाब देते हुए किसान नेता डॉक्टर दर्शन पाल कहते हैं, ‘ये सरकार पूरे देश को कॉर्पोरेट के हवाले करने की दिशा में काम कर रही है। अडानी-अंबानी कॉर्पोरेट के सबसे बड़े चेहरे हैं जो पिछले थोड़े ही समय में बहुत तेजी से आगे बढ़े हैं और मुख्य कारण यही है कि राज सत्ता और पूंजी साथ-साथ चल रहे हैं। ये दोनों ही ग्रुप मौजूदा सत्ता के बेहद करीब हैं और ये किसी से छिपा नहीं है।

इसके अलावा इन दोनों घरानों का नाम प्रतीकात्मक रूप से भी इस्तेमाल होता है। हमने इनके अलावा अन्य कॉर्पोरेट घरानों का भी विरोध किया है जिसमें Essar ग्रुप जैसे नाम भी हैं। उनके पेट्रोल पंप का भी बहिष्कार पंजाब में हुआ है। ये विरोध किसी व्यक्ति या एक-दो कॉर्पोरेट घरानों का नहीं बल्कि पूरे कॉर्पोरेट के हवाले जाते संसाधनों का विरोध है। इसीलिए हमने सबसे से मांग की है कि कॉर्पोरेट घरानों के तमाम उत्पादों और सेवाओं का बहिष्कार किया जाए।’

प्रदर्शनकारियाें का कहना है 'जिन्हें लगता है किसान आतंकवादी हैं वो अपना खाना खुद ही उगाएं।'

‘जो भी जनता का शोषण कर रहा है हम उसके खिलाफ हैं’

किसानों के दूसरे बड़े नेता गुरनाम सिंह चढूनी अडानी-अंबानी के खिलाफ विरोध तेज किए जाने के बारे में कुछ और कारण भी गिनाते हैं। वे कहते हैं, ‘इस देश में पहले लोकतंत्र का मतलब होता था लोगों का राज, लोगों के द्वारा, लोगों के लिए। अब ये हो गया है कॉर्पोरेट का राज, कॉर्पोरेट के द्वारा, कॉर्पोरेट के लिए। इस तरह से एक आदमी या चंद लोग ही पूरे देश को हड़प रहे हैं और इसी के खिलाफ हमारा विरोध प्रदर्शन है।’

चढूनी मानते हैं कि अडानी-अंबानी का नाम मुख्यत: प्रतीक के तौर पर लिया जा रहा है क्योंकि वे इस दौर में कॉर्पोरेट के सबसे बड़े चेहरे हैं। वे कहते हैं, ‘हमारी किसी से व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं है। ये आंदोलन बस जनता बनाम कॉर्पोरेट का है और जो भी जनता का शोषण कर रहा है हम उसके खिलाफ हैं।’

किसान नेता डॉक्टर दर्शन पाल और गुरनाम सिंह चढूनी दोनों ही अडानी और अंबानी ग्रुप के खिलाफ हो रहे प्रदर्शन को प्रतीकात्मक बताते हैं। लेकिन इस आंदोलन के एक अन्य बड़े किसान नेता बलबीर सिंह राजेवाल मानते हैं कि अडानी-अंबानी के विरोध के कई कारण और भी हैं। वे कहते हैं, ‘विरोध में अडानी-अंबानी का ही नाम इसलिए आ रहा है क्योंकि असल में ये सरकार हो वही दोनों चला रहे हैं।

आप बहुत बारीकी में न भी जाएं तो भी देखें कि आज तेल का सेक्टर अंबानी के पास है, संचार उनके पास है, डिफेंस उनके पास है और उनके मुकाबले कोई दूसरा नहीं है। इसी तरह से कोयला अडानी के पास है, रेलवे में अडानी लगातार मजबूत हो रहा है, एयरपोर्ट उन्हें मिल रहे हैं. एक-एक करके सारे सेक्टर इन्हीं के पास जा रहे हैं और यही दोनों सरकार को निर्देश देते हैं। सरकार इन्हीं के हिसाब से चलती है इसलिए हमने इन दोनों के खिलाफ ऐसे फैसले लिए हैं।’

अडानी और अंबानी ग्रुप का पूरी तरह बहिष्कार करने के पीछे कुछ अन्य कारण बताते हुए बलबीर राजेवाल कहते हैं, ‘लोगों को कॉर्पोरेट का ये खेल भी समझना होगा। नेता, अफसर और कॉर्पोरेट मिलकर सारे देश को लूट रहे हैं। इनका अपना पैसा कुछ नहीं होता।

अडानी और अंबानी जैसे घराने कंपनी फ्लोट करते हैं और हजारों-करोड़ की पब्लिक मनी जमा कर लेते हैं, उसी पूंजी के आधार पर फिर बैंक से करोड़ों का लोन उठाते हैं और फिर उसे चुकाने से मुकर जाते हैं जो पैसा डूबता है वो जनता का है। फिर ये लोन एनपीए घोषित हो जाता है, बैंक को बचाने के लिए सरकार को खर्च करती है वो सारा जनता का पैसा होता है।

ये लड़ाई इसीलिए सिर्फ किसानों की नहीं, कॉर्पोरेट के इस चंगुल से पूरे देश को बचाने की लड़ाई है।’



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किसान आंदोलन में ऐसे पोस्टर्स के जरिए किसान प्रधानमंत्री की जगह अब सीधे अंबानी-अडानी से अपील कर रहे हैं।


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