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किसान नेता बोले- हमेें पता है होना कुछ नहीं, पर सरकार को बेनकाब करने के लिए बैठक में जाएंगे https://ift.tt/3q62FZj

बीते शुक्रवार किसानों की सरकार के साथ बातचीत एक बार फिर से विफल रही। अब 15 जनवरी को किसान नेता 9वीं बार केंद्रीय मंत्रियों से मिलेंगे। लेकिन इस बैठक को लेकर भी किसान नेताओं में कोई उत्साह नहीं है और करीब सभी किसान नेता ये मान रहे हैं कि अगली बैठक भी बेनतीजा ही रहने वाली है।

ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब किसान नेताओं को इन बैठकों से समाधान की कोई उम्मीद ही नहीं है तो वे बैठक में शामिल ही क्यों हो रहे हैं? किसान नेता जोगिंदर सिंह उग्राहां इस सवाल पर कहते हैं, ‘शहीद भगत सिंह से भी ऐसे ही सवाल पूछे जाते थे कि जब आपको न्यायालय से न्याय मिलने को कोई उम्मीद नहीं है तो आप हर तारीख पर अदालत क्यों जा रहे हैं। तब भगत सिंह का जवाब होता था कि हम अदालत इसलिए जा रहे हैं ताकि पूरे देश की अवाम को अपनी आवाज पहुंचा सके। हम भी इन बैठकों में सिर्फ इसीलिए जा रहे हैं।’

इन बैठकों के बेनतीजा रह जाने के लिए सरकार को जिम्मेदार बताते हुए उग्राहां कहते हैं, ‘बातचीत हमारे कारण नहीं, बल्कि सरकार के कारण विफल हो रही हैं। हमारी मांग तो बहुत सीधी है कि तीनों कानूनों को रद्द किया जाए, उसके बिना हम वापस नहीं लौटेंगे। सरकार को ये बात हम कई बार बता चुके हैं, लेकिन फिर भी वो हर बार हमें बुलाती है और ये मांग नहीं मानती। वो अगली बार भी ऐसा ही करेंगे, लेकिन हम फिर भी बैठक में शामिल होंगे ताकि सरकार को बेनकाब कर सकें।’

किसान नेता जोगिंदर सिंह उग्राहां कहते हैं कि तीनों कानूनों को रद्द किया जाए, उसके बिना हम वापस नहीं लौटेंगे।

किसान नेता गुरनाम सिंह चढूनी भी मानते हैं कि सरकार के साथ हो रही इस बातचीत से समाधान नहीं निकालने वाला है और 15 जनवरी को होने वाली वार्ता भी पूरी तरह से विफल होने जा रही है। इसके बावजूद भी बैठक में शामिल होने के बारे में वे कहते हैं, ‘सरकार ने पहले ही इस आंदोलन को बदनाम करने की बहुत कोशिश की है। कभी हमें खालिस्तानी कहा गया, कभी आतंकवादी कहा गया और कभी कहा कि हम नकली किसान हैं। हम अपनी तरफ से सरकार को ऐसा कोई मौका नहीं देना चाहते कि वो किसानों को बदनाम करे। इसीलिए हम बैठक में आते हैं। ऐसे में सरकार ये नहीं कह सकती है कि हम बातचीत के लिए तैयार हैं, पर किसान ही इससे पीछे हट रहे हैं। इसीलिए हम ये जानते हुए भी अगली बैठक में जाएंगे कि उस दिन भी समाधान तो नहीं होने वाला है।’

किसानों की सरकार से बातचीत इसलिए अटक गई है, क्योंकि किसान कानूनों के रद्द होने से कम पर मानने को तैयार नहीं हैं और सरकार कानूनों को रद्द करने के लिए तैयार नहीं है। ऐसे में सरकार लगातार ये प्रयास कर रही है कि बातचीत के जरिए कोई बीच का रास्ता निकाला जा सके।

किसान नेता हन्नान मुल्ला कहते हैं, ‘ये कानून किसानों की मौत के वारंट हैं। इस पर कोई समझौता या बीच का रास्ता कैसे हो सकता है। मौत का वारंट तो रद्द ही किया जाता है, उसमें संशोधन नहीं होते। हम ये भी जानते हैं कि सरकार भी मानने वाली नहीं है। सरकार ने ये कानून उन लोगों के लिए बनाए हैं, जिनके पैसे से वो चुनाव जीते हैं, जिनके जहाजों में वो चुनावी रैली करते हैं। कानून वापस लेकर वो पूंजीपतियों को नाराज नहीं कर सकते। अगली बैठक में भी सरकार नहीं मानेगी, ये हम जानते हैं। इसलिए अपने संघर्ष को ऐसे आगे बढ़ा रहे हैं कि सबसे बेहतर नतीजों की उम्मीद करो, लेकिन सबसे बुरे नतीजों के लिए तैयार रहो।’

उत्तर प्रदेश के बड़े किसान नेता राकेश टिकैत कहते हैं कि सरकार इस आंदोलन को कमजोर करने के लिए ही तारीख पर तारीख दे रही है।

बीते शुक्रवार को हुई बैठक में सरकार ने यह भी प्रस्ताव दिया है कि किसान चाहें तो सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं और वहां इन कानूनों को चुनौती दे सकते हैं। इस प्रस्ताव पर अखिल भारतीय किसान सभा के नेता मेजर सिंह कहते हैं, ‘कोर्ट की भूमिका कानूनों की समीक्षा करते हुए यह तय करने की है कि कोई कानून संविधान के दायरे में है या नहीं। हम तो कानूनों की संवैधानिकता को चुनौती दे ही नहीं रहे तो कोर्ट जाकर क्या करेंगे। कानून बनाना सरकार के अधिकार क्षेत्र में है, लेकिन वो कानून किसान हितैषी नहीं हैं इसलिए हमारी लड़ाई सरकार से है और जब तक हम ये लड़ाई जीतेंगे नहीं, तब तक सरकार से लड़ते रहेंगे।’

सरकार से हो रही बातचीत को भी इसी लड़ाई का हिस्सा मानते हुए उत्तर प्रदेश के बड़े किसान नेता राकेश टिकैत कहते हैं, ‘सरकार इस आंदोलन को कमजोर करने के लिए ही तारीख पर तारीख दे रही है। इनसे होना कुछ नहीं है। बस लोग बिना मुकदमे की तारीख झेल रहे हैं। अगली बैठक में भी यही होगा। सरकार को लगता है कि ऐसा करने से आंदोलन कमजोर होगा और जनता में ये संदेश जाएगा कि सरकार तो बात कर रही है, लेकिन किसान नहीं मान रहे। हम भी इसलिए बैठक से मना नहीं कर रहे, क्योंकि हम जनता को बताना चाहते हैं कि हम तो अपनी मांगों को लेकर बिलकुल स्पष्ट हैं और वो सरकार है, जो मान नहीं रही।'

गतिरोध की यही स्थिति बनी रही तो बातचीत का औचित्य क्या रहेगा और ऐसा कब तक चलेगा? इस सवाल पर राकेश टिकैत कहते हैं, ‘फिलहाल तो यही समझ लीजिए की हम अगली बैठक के बहाने 26 जनवरी को होने वाली ट्रैक्टर परेड की रेकी कर लेंगे। उस दिन किसान मार्च निकलेगा। तब भी सरकार नहीं मानी तो आंदोलन चलता रहेगा। हम मई 2024 तक ये आंदोलन चलाएंगे, जब तक इस सरकार का कार्यकाल पूरा नहीं हो जाता।’



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15 जनवरी को किसान नेता एक बार फिर केंद्रीय मंत्रियों से मिलेंगे। लेकिन इस बैठक को लेकर भी किसान नेताओं में कोई उत्साह नहीं है, वे मान रहे हैं कि अगली बैठक भी बेनतीजा ही रहने वाली है।


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